Sunday, 19 February 2017

अच्छे दिन



आर्मी कैंप पर
आतंकवादी हमला 
रक्षा मंत्री ने
फेसबुक पर उसे फेस किया
प्रधानमंत्री
ट्विटर पर गुर्राए
गृहमंत्री ने
सोशल मीडिया पर
पड़ोसी को धमकी दी
वित्त मंत्री प्रेस्टीट्यूट्स के
कानों में फुसफुसाए
कवियों ने भारतीय सेना की
शहादत के गीत गाए
भक्तों का कहना है
अच्छे दिन आए
अच्छे दिन आए .
नमन


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असहाय
प्रतिदिन देखता हूँ
लंगडी सुबह के
अभिशप्त बैसाखियों के सहारे
उजाले से 
अंधेरे की तरफ बढ़ते हुए कदम
विवशता
छटपटाहट
और पीड़ा
अपने अंतस में छिपाए
उसके कान बहरे हो रहे हैं
पीछे से आ रही आवाजों से
........आगे बढ़ो
हम तुम्हारे साथ हैं
पर साथ देने के लिए
नहीं उठता कोई कदम
नहीं बढ़ाता कोई हाथ
सिर्फ आवाजें हैं
वादे हैं
झूठे और
कभी न पूरा होने वाले वादे.
नमन

Saturday, 18 February 2017

अच्छे लोग

अच्छे लोग
अच्छी किताब की तरह
होते हैं
वे जिल्द देख कर
समझ में नहीं आते 
उन्हें बार-बार
पढ़ना पड़ता है !
'नमन'

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सत्ता के मद में 
लाल-लाल हुए चेहरे
नीले पड़ जाते हैं
आईना देख कर
अंध भक्तों को 
आंखों की जरूरत है
चक्षु विहीन भक्त
अपने अग्यान को
सत्य समझ कर
खुश हैं
जबकि
नंगा राजा
ढकेल रहा है
अंधो को
अंध कूप की तरफ....
कबीर ने ठीक ही कहा था
जाका गुरु हो आंधला चेला खरा निरंध
अंधे अंधा ठेलिया दोनों कूप पडंत.


नमन 

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कभी अकेले में आईने में निहारा करिए
आंखो आंखो में खुद ही खुद को इशारा करिए.
जब कोई पास न हो खुद को संवारा करिए,
खुद से मिलने की जहमत तो गवारा करिए. नमन


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आँखों में जिसके ख्वाब पाले थे
उसीने आँखें फेर ली हमसे। ‘नमन’


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तू दुवा कर कि मेरी याददाश्त खो जाए
तेरे बिछुड़ने गम से निजात हो जाए। ‘नमन’


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वतन पर मरने वालों को ये उनका हक नहीं देते
आज कल लोग शहीदों को इज्ज़त तक नहीं देते. 'नमन'


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कसूर मेरा था और उसने सजा खुद को दी 
इस तरह हमसे निभाई है मोहब्बत उसने. नमन


मजबूत रिश्ते



तुम जो आए तो चिरागों को मिल गई मोहलत
फिर उसके बाद महफिल में अँधेरा न रहा. नमन


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उनको आईना दिखाने की हिमाकत की है
उनको उनसे ही मिलाने की शरारत की है.
इस अंधेरे की काली सियासत के खिलाफ 
आज एक छोटे से दीपक ने बगावत की है. नमन


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गिरने, उठने, संभलने में ही सारी जिंदगी बीती
मोहब्बत के लिए दुनियां ने वक्त ही न दिया.
नमन


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कोई मेरे गीत गाए, कोई मुझ से दिल लगाए
कोई मुझ पर आशना हो, कोई मेरे दिल को भाए.
कोई साथ साथ मेरे, कुछ कदम तो चल के देखे
कोई मेरी मोहब्बत में कुछ पल तो मुस्कुराए.
कोई मेरा दर्द समझे, मेरे दिल का हाल जाने
कोई मेरा ख्वाब बनकर मेरी जिंदगी में आए.
कोई मेरे आंसुओं से, लिखे इश्क की कहानी
कोई बेवजह ही मुझको, अपने गले लगाए.
नमन

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ये मेरे कातिल की हाँ में हाँ मिलाता है
इस तरह दिल मेरा मुझसे दुश्मनी निभाता है.
नमन

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तड़प तड़प के मरूंगा मुझे पता है ए
मेरी खता ए है कि मैंने मोहब्बत की है.
नमन

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बर्बाद मुझे मेरे दोस्तों ने किया है 
इल्जाम दुश्मनों पर लगाता रहा हूं मैं. नमन

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ए इश्क का नशा भी बड़ा ही अजीब है
जब होश में आए तो घर उजड़ा हुआ मिला. 
वाकिफ हूँ हुश्न तेरी हर एक अदा से मैं
जिस पर मेरा दिल आया वही बेवफा मिला. 
नमन

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दिलों के जख्म है नासूर हो कर बहते हैं
इतने आँसू वरना किस आँख से निकलते हैं. 
नमन

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बहुत मजबूत रिश्ते हैं मेरे कमजोर लोगों से
उनकी भूख,उनका दर्द,आंसू सब हमारे हैं. नमन

भारत की कहानी...


अमानुषिक वृत्तियों के 
प्रबल वेग
संस्कारों के क्षय
और प्रेम के अधःपतन की
वीभत्स दास्तान हैं 
बलात्कार
जिसे हमारे समय के माथे पर
चिपका दिया गया है
इश्तिहारों की तरह.
नमन


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खोद कर छोड़ दी गई
उपेक्षित सड़क सी 
उदास जिंदगी
सड़क कूटते हुए 
रोलर सी मदमस्त 
सबको दबाती कुचलती
अफसरशाही
गिट्टी की तरह
चूर चूर होते 

आम आदमी के सपने
ढल रही शाम
खेतों में जी तोड़ मेहनत के बाद
बिखर रहे कल को
मजबूती से अपनी मुट्ठी में दबाए
पगडंडियों से होकर
घर की तरफ लौटते हुए किसानों की
झुकी हुई कमर
और उतरे हुए चेहरे
धीरे-धीरे
चारों तरफ पसरती हुई खामोशी
पसीने से लथपथ
थक कर चूर
काम से लौटते हुए मजदूर की
निस्पृह भाव से
सबको निहारती आँखें
डबडबाई सी आंखों की तरह
झुग्गियों में टिमटिमाती हुई
रोशनी
खुली हुई आंखों से
अच्छे कल के
सपने देखता आदमी
यही है आज के
भारत की कहानी...
नमन

Friday, 16 December 2016

परहित सरिस धरम नहिं भाई

परहित सरिस धरम नहिं भाई – पर पीड़ा सम नहिं अघमाई .
८ नवम्बर की रात १२ बजे से नोट बंदी की घोषणा क्या हुई, तबसे आधा हिंदुस्तान बैंक की लाइन में है.
जनता इस भ्रम में खुश हैं की भले उन्हें लाइन में लगना पड रहा है, भले कई कई दिन से वे परेशान हैं पर काला धन रखने वाला बड़ा व्यापारी जादा परेशान है.

बड़ा व्यापारी खुश है जनता को लाइन में खड़ा परेशान होते, मरते देख कर.
क्या पाप है बैंक की लाइन में खड़े किसान ने? क्या पाप किया है लाइन में खड़े दिहाड़ी मजदूर ने? क्या पाप किया है सब्जी का ठेला लगाने वाले आदमी ने? पर ये सब लाइन में खड़े हैं. ३६ दिन से लगातार लाइन मे खडा है आधा हिन्दुस्तान और भक्त खुश हैं.
देश का लगभग ५०% हिस्सा अभी भी इन्टरनेट से नहीं जुडा है और प्रधानमंत्री खुश हैं, मुस्कराते हुए डिजिटल बैंकिंग की बात कर रहे हैं.
देश के लाखों मजदूर बेकार हो गए हैं. लोगों के पास दवा के लिए पैसे नहीं हैं, पैसे के लिए गरीब बेटियों की शादियाँ रुक गयी हैं पर बीजेपी नेता खुश हैं.
बड़े व्यापारी और नेता १०० से ५०० करोड़ तक शादियों पर उड़ा रहे हैं. कोई बड़ा व्यापारी बैंक की लाइन में नहीं है. बैंक के कर्मचारी खुद बड़े लोगों को करोड़ों रु के नए नोट पहुंचा रहे हैं. अंध भक्त खुश हैं.
भ्रष्टाचार बढ़ गया है. ३० से ४०% में पुराने नोट की जगह नए नोट मिल रहे हैं. हजारों बैंको के कर्मचारी करोडपति हो चुके हैं. सुनार ५०,००० रु तोला तक सोना बेंच कर माला माल हो गए हैं, पेट्रोल पम्प वालों, डाक्टरों, रेल कर्मचारियों ने लाखों रु के पुराने नोट नए नोट में बदल कर हजारों करोड़ कमा लिए.
नोट बंदी पर आरएसएस खुश है, बीजेपी खुश है.
इस नोटबंदी मे सिर्फ BJP ही है जो हजारो बाईक खरीद रही, सैकडो प्लाट खरीद रही है और सैकड़ो करोड़ो खर्च करके परिवर्तन रैलिया कर रही है ... वो भी सब नगद कैश.. अंध भक्त खुश हैं !!!
‘नमन’

Thursday, 15 December 2016

गिरगिट


समयानुसार 
रंग बदलने में 
सरकार ने 
पीछे छोड़ दिया है 
गिरगिट को 

आखिर अस्तित्व का 

प्रश्न है ...

काले से सफ़ेद
और
काले से भगवा होने में
अंतर है
यही वह जादुई मंतर है
जिससे
सत्ता मालामाल
और
जनता ठन-ठन गोपाल है...

'देश' गायब है
सत्ता और विपक्ष के
बीच से
सरकार कह रही है
'देश' सीमा पर है
विपक्ष नकार रहा है
जनता ठिठुर रही है
कडाके की ठण्ड में
बैंक की लाईनों में खड़े-खड़े
'देश' के लिए ,,,!
'नमन'

Sunday, 11 December 2016

प्रेस्टीटयूट

बड़ा मुश्किल है सच कहना, बड़ा मुश्किल है सच सुनना
मगर बेहद जरूरी है , सच से रू-बरू रहना । नमन

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास जनजागरण का इतिहास रहा है. स्वतंत्रता आन्दोलन में उनका त्याग और बलिदान  एवं उसके बाद स्वतंत्र भारत के नवनिर्माण और उसके राजनैतिक एवं आर्थिक विकास में पत्रकारिता का योगदान भुलाया नहीं जा सकता.
राजनीती के महासुर्यों को भ्रष्टाचार और अनैतिकता का ग्रहण लगने से हुए राजनैतिक मूल्यों के ह्वास के साथ- साथ यह आईना भी स्वार्थ, सत्ता और संपदा की चिकनाई से धुंधला पड़ता चला गया. पत्रकारिता मिशन से चल कर कमीशन के मोड़ पर कब आ खड़ी हुयी, हमें पता तक न चला.
प्रणम्य पत्रकार अचानक ‘प्रेस्टीटयूट’ हो गया. जिन ताकतों के यहाँ पत्रकार ने अपनी कलम गिरवी रखी वे ही आज उसे विभिन्न संबोधनों से महिमामंडित कर रहे हैं. जो बिकाऊ है, खरीदा जा सकता है और जो खरीदा जा सकता है वह आदर का पात्र कभी नहीं होगा.
खबरे बेचीं और खरीदी जा रही हैं, बोलियाँ लग रही हैं, नीलामी जारी है, देश बिक रहा है.....
सत्ताधीश पत्रकार को पैर की जूती समझता है, क्योंकि अखबार और चैनल का मालिक पहले ही खरीदा जा चुका है. आज अधिकतर अखबार सत्य से परे सत्ताधीशो के विज्ञापनपत्र बन कर रह गए हैं. टीवी चैनलों की हालत उससे भी बुरी है. टीवी एंकर कुछ ही साल में सैकड़ों करोड़ का मालिक यूँ ही नहीं बन जाता. ऐसे में हम सत्य और असत्य का विवेक किसके कैसे कर पाएंगे?
यह राहू काल है. सत्य बोलने वाला देशद्रोही घोषित कर दिया गया है. नंगे राजा को ‘भांट’ दिव्य वस्त्रों से सुशोभित बता रहा है, लोकतंत्र मृतप्राय है और चारण मंगल गीत गा रहे हैं.
दूर आसमान से अँधेरा धीरे धीरे उतर रहा है. हम बढ़ रहे हैं ‘प्रकाश से अंधकार की ओर’ ...  सूर्यपुत्र तैयार है उलूक बनने के लिए, सवार है उसपर लक्ष्मी का भूत ......

‘नमन’

Wednesday, 7 December 2016

जानता हूँ


जानता हूँ 
चढा दिया जाऊंगा 
सूली पर
एक दिन
परंतु 
सत्य, प्रेम और उदारता
जैसे मानवीय गुण
नहीं छीन पाएंगे
वे मुझसे...
'नमन'

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अपने लहू से हमने लिखी हैं इबारतें 
लिपटी हुई हैं हर एक लफ्ज में मोहब्बतें। 
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खता गर की है तो सूली पे चढ़ा देना तुम
उसके पहले मेरी गलती तो बता देना तुम। 
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तड़प-तड़प के मरूँगा मुझे पता है ए
मेरी खता ए है की मैंने मोहब्बत की है। 
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बर्बाद मुझे मेरे दोस्तों ने किया है
इल्जाम दुश्मनों पर लगाता रहा हूँ मैं।  

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जब मेरे आँसू से पिघला नहीं वो पत्थर दिल
मेरी आँखों ने तबसे मुस्कराना सीख लिया। 'नमन'
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हमारी जमीन
टाटा, अडानी, अंबानी के लिए छीनी
सड़क, रेल और एअरपोर्ट
के लिए उजाड़े हमारे घर
अपने स्विमिंग पूलो़ के लिए
छीना हमारा पानी
मांगे हमसे
हमारे जवान बेटे
देश पर शहीद होने के लिए
दिया हमने
अपने पसीने से सींच कर
उगाया अन्न
तुम्हारा पेट भरने के लिए
रावण की औलाद तुम
लूटते रहे हमारी बहन बेटियों की इज्ज़त
और अब
हमारी अपनी
खून पसीने की गाढी कमाई के लिए
हम मर रहे हैं लाईनों में...
कहाँ हो विष्णु
कहाँ हो राम
कहाँ हो कृष्ण..
अगर तुमने आने में कर दी देर
तो हो जाएगा अनर्थ
नहीं बचेगा यहाँ कुछ
ऩ सत्ता, न शासक, न देश...
'नमन'


Tuesday, 29 November 2016

-अभिशप्त कांग्रेस-
मैं कांग्रेस को अभिशप्त क्यों कह रहा हूँ?.
आज कांग्रेस इतिहास के जिस मोड़ पर खड़ी है, वह वहां कैसे पहुंची? क्या इसपर आत्ममंथन नहीं होना चाहिए. कांग्रेस के सभी नेता इससे सहमत हैं की कांग्रेस एक ‘विचार’ है. विचार शाश्वत होते हैं, मरते नहीं. पर अगर इन विचारों को मथा न जाए, आंदोलित न किया जाये तो यह धीरे धीरे शांत होकर तलहटी में बैठ जाते हैं. लोगों को दिखाई नहीं पड़ते, अनुभव में नहीं आते. कांग्रेस का मूल चरित्र आन्दोलन का रहा है. यह आन्दोलनों से पैदा हुयी, आन्दोलनों में पली और बलिदानों से जवान हुयी.
लगातार सत्ता में रहने के कारण यह अपना आंदोलनात्मक चरित्र खोकर चेहराविहीन हो गयी है. आज कांग्रेस अपना अस्तित्व तलाशती नज़र आ रही है. यह कांग्रेस के लिए आत्मचिंतन/ आत्ममंथन का समय है. कांग्रेस अपनी समस्याओं का हल बाहर खोज रही है, जबकि उसकी समस्याओं का हल उसके अन्दर ही है.
कांग्रेस ने इस देश को प्रजातंत्र नाम का नया धर्म दिया. उस धर्म को जिंदा रखने की, फलने फूलने देने की जिम्मेवारी भी कांग्रेस पर है. कांग्रेस को प्रखर राष्ट्रवाद, समाजवादी चिंतन और आन्दोलन के अपने मूल चरित्र को जनता में उजागर करना होगा.
आन्दोलन की राजनीती से कांग्रेस कार्यकर्त्ता के आत्मविश्वास में वृद्धि होगी, उसका मनोबल बढेगा और प्रखर राष्ट्रवाद उसे नवयुवकों से जोड़ेगा. कांग्रेस में नवउर्जा का संचार नयी पीढ़ी ही कर सकती है. नवयुवक उर्जावान होता है, उसकी सकारात्मक उर्जा को दिशा देनी होगी, उसे प्रोत्साहित करना होगा.
कांग्रेस को नए नारों की जरुरत है, नए विचारों की जरुरत है, नए युवाओं की जरुरत है.
मैं हमेशा से कहता आया हूँ की कांग्रेस में दो तरह के लोग हैं, १- जो कांग्रेस में हैं. २- जिनमे कांग्रेस है. जो कांग्रेस में हैं वे रहें, उनका स्वागत है पर जिनमे कांग्रेस है उन्हें जिंदा करना होगा, उनमे आग फूकनी होगी.
अगर कांग्रेस का वर्तमान नेत्रित्व दिशाहीन होकर टुकड़ों की राजनीति करेगा तो देश पर इसके बहुत विपरीत परिणाम होंगे और हमारे पुरखे जिन्होंने अपनी शहादतों, अपने खून और पसीने से यह देश रचा, बनाया, विकसित किया ... हमें कभी माफ़ नहीं करेंगे.
कांग्रेस नेतृत्व राष्ट्र चेतना/ प्रखर राष्ट्रवाद की मशाल जलाने और आन्दोलन के माध्यम से उसे जन जन तक पहुंचाने का काम जितना शीघ्र शुरू करेगा उतना शीघ्र कांग्रेस का पुनरुत्थान होगा.
आपका,
ओमप्रकाश(मुन्ना) पाण्डेय उर्फ़ ‘नमन’

कल्याण 

Monday, 21 November 2016

सत्य


माफ़ करिए 
नहीं हूँ मैं कवि 
मैं कवि बिलकुल नहीं हूँ 
कवि 
तराशता है सत्य को 
रचता है छंद 
गढ़ता है बिंब
जोड़ता है उसे 
विमर्शों के माया जाल में 
मैं तो 
आईना हूँ 
देखता हूँ 
और दिखा देता हूँ आपको 
पूर्ण सत्य 
जैसे का तैसा 
बिना किसी कांट छांट 
या 
जोड़ तोड़ के....
'नमन'