Friday, 11 January 2019

ईश्वर और देशप्रेम


आरफा खानम शेरवानी, राज्य सभा टीवी पर काम कर चुकी हैं, आज कल 'द वायर' की सीनियर एडिटर हैं, 
विदुषी हैं, मैं उनका सम्मान करता हूँ। उन्होने ट्वीट किया है की भारत माता की जय कहना सांप्रदायिक 
(कम्यूनल) है। क्योंकि इससे इस अवधारणा को बल मिलता है की भारत माता 'देवी' हैं। वे कहती हैं की वे इसका
विरोध इसलिए करती हैं क्योंकि वे इस्लाम मे विश्वास करती हैं और कहती हैं की ईश्वर एक है। वे कहती हैं की 
उन्हे यह स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए की वे अपने देश को माँ -पिता-भाई या बहन न कहें ।

मेरी समझ मे 'भारत माता की जय' के  विवाद को तूल देकर आरफा जी बड़ी सफाई से खुद को मुसलमानों का 
हितचिंतक साबित करना चाहती हैं। वे कहती हैं की ईश्वर एक है। सनातन धर्म भी यही कहता है , 
'एको अहम द्वितीयों नास्ति' यानि ईश्वर एक है। सीख धर्म भी यही कहता है एक ही ओंकार की बात करता है।
 मुझे आरफा जी के देश प्रेम पर किंचित भी संदेह नहीं है। परंतु वे धर्म को देश प्रेम के सामने खड़ा करके जो 
राजनीति कर रही हैं उससे मैं किंचित भी सहमत नहीं हूँ। यहाँ मैं बहादुरशाह जफर से सहमत हूँ, जिन्होने 
कहा था;
'नाहक ही तेरे दिल मे भटकाव पड़ गया
काबे मे जो है शेख, वही बुतकदे मे है।'

मेरी समझ मे यहाँ बहादुरशाह जफर भी एकेश्वरवाद की बात कर रहे थे, जो आरफा जी कर रहीं है, जो सनातन 
धर्म करता है, जो ईसाई और सीख धर्म करते हैं। परंतु बहादुरशाह जफर जहां जोड़ने की बात करते नज़र आते थे
 वहीं आरफा जी दिलों मे दूरियाँ पैदा करने की बात करती नज़र आती हैं। 

हम जब भारत माता की जय कहते हैं तो कहीं भी अपनी मातृभूमि को ईश्वर नहीं कहते हैं बल्कि उसे माँ का दर्जा
 देते हैं। उसकी जय कहना उसे ईश्वर कहना नहीं है। मेरी राय मे माँ की जय करने मे आरफा जी को कोई परेशानी
 नहीं होनी चाहिए।  'जय हिन्द' और 'भारत माता की जय' मे सिर्फ शब्दों का फर्क है, दोनों का भाव एक ही है। 
दोनों मातृभूमि के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। जब भारत का मुसलमान गर्व से 'जय हिन्द' कह सकता है तो 
उसे उतने ही गर्व से 'भारत माता की जय' बोलने मे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। 

यूरोप मे देश को मदर लैंड कहा गया। भारत मे हम इसे 'जन्म भूमि' कहते थे। सनातन धर्म मे  'जननी 
जन्मभूमिश्च -स्वर्गादपि गरीयसी' कहा गया है। जब हम भारतमाता की जय कहते हैं तो अल्लाह, खुदा , ईश्वर,
 गॉड  के सामने एक और परमात्मा को खड़ा करने की बात नहीं करते। 

इस देश के मुसलमान ने इस देश की स्वतन्त्रता के लिए, इसके पुनर्निर्माण के लिए, इसकी रक्षा के लिए उतना 
ही बलिदान दिया है जितना किसी हिन्दू, सीख, ईसाई, पारसी या अन्य ने।  इस मुल्क का मुसलमान इस देश से
 उतनी ही मोहब्बत करता है, जितना अन्य भारतीय। ऐसे मे अपनी संकुचित विचारधारा से हिन्दू और 
मुसलमानो मे दुई का निर्माण करना एक बेहद गलत और चिंताजनक बात है। हमे इससे बचना चाहिए और 
अपनी क्षमताओं का उपयोग राष्ट्र निर्माण मे करना चाहिए। 
' धर्म- मजहब -जातियाँ सब काम हैं शैतान के
आँख के आँसू -मोहब्बत नाम है इंसान के। 
चाहे माथे पर तिलक हो या निशान नमाज़ के
सब मुहाफ़िज़ हैं हमारे अपने हिंदुस्तान के। '
नमन 

Thursday, 27 December 2018

जननी


वह मुझको जन्मती है बोझ मेरा सब उठाती है
वो मेरी बहन है स्नेह का झरना बहाती है।
वह मेरी प्रेयसी है मेरे ख्वाबों को सजाती है
वो बीबी है मेरी, मेरा घर वह ही चलाती है ।
मेरी दादी - मेरी चाची, मेरी बुआ- मेरी भाभी
सब मुझ से प्रेम करती हैं मेरे नखरे उठाती है ।
वो मेरी बेटियां हैं वे मेरे दिल का टुकड़ा हैं
मेरे आंगन में खुशियां और बहारें वे ही लाती हैं।
मैं सबको चाहता हूँ और सब से प्यार करता हूँ
मैं सबको पूजता हूँ आज फिर इकरार करता हूँ.   नमन

Wednesday, 26 December 2018

सलीब







सलीब पर
सिर्फ ईसा ही नहीं
उससे बहुत पहले
भीष्म भी चढे थे
इच्छा मृत्यु के वरदान के बावजूद.


ठोक दी जाती हैं
झूठ- फरेब
नफरत और हिकारत की कीले
हमारी आत्मा में
लटका दिया जाता है
समय के क्रास पर.

आज भी
एक पूरा परिवार
लटका हुआ है सलीब पर
रिस रहे हैं उनके घाव
असह्य पीड़ा के बावजूद
मुस्कुरा रहे हैं वे
तुम शायद नहीं देख पाए
पर देख रहा हूं मैं उन्हें
धीरे-धीरे मरते हुए.

तुम्हारी नफरत की कीलें
पैबस्त हैं उनके सीने में
तुम्हारे झूठ से
लहूलुहान हैं उनके शरीर
तुम्हें बचाने के लिए
उन्होंने सामने कर दिया है
खुद को मौत के
ताकि तुम मुस्कुरा सको
नए वर्ष के स्वागत में.
नमन

Friday, 21 December 2018

अगर चलना जरूरी है




मुलाकाते नहीं होने से चाहत कम नहीं होती,
मुलाकाते नहीं होने से चाहत कम नहीं होती,
उम्र के साथ बढ़ती है मोहब्बत कम नहीं होती.काते नहीं होने से चाहत कम नहीं होती,
उम्र के साथ बढ़ती है मोहब्बत कम नहीं होती.के साथ बढ़ती है मोहब्बत कम नहीं होती.कम नहीं होती,
उम्र के साथ बढ़ती है मो


अगर चलना जरूरी है तो रुकना भी जरूरी है
अगर दर्द मिल जाए तो सहना भी जरूरी है.
सुबह से शाम तक जिसके लिए यह दिल धड़कता है
जिसे हम चाहते हैं उससे कहना भी जरूरी है. 

****

वो शख्स जो मेरी आंखों को ख्वाब बेच गया
मेरी नजरों को उसकी तलाश आज भी है.
जब भी उठता है दर्द सीने में 
ऐसा लगता है कि वह आस पास आज भी है.

****

किसी के खत का हमें इंतजार आज भी है
किसी के लिए यह दिल बेकरार आज भी है.
एक तुम हो कि तुम्हें हमसे मुरव्वत ही नहीं
एक हम हैं कि हमें तुमसे प्यार आज भी है. 

**** अपने खंजर से खोद कर दिल को 
चंद कतरा लहू निकाला है। 
यह मेरा शेर नहीं है साहब 
दर्द का छलक रहा प्याला है। 
****

बात की बात पर बे-बात कोई बात न कर
बात बेवक्त जो निकली तो घात कर देगी.

****

मैं मोहब्बत हूँ दिलों में मुकाम करता हूँ
हुस्नवालों का बहुत एहतिराम करता हूँ. 

****

जुगनू ने तम से जंग का ऐलान कर दिया
लड़ता रहा चिराग रात भर हवा के साथ.
जब दिल का सौदा कर लिया उस बेवफा के साथ
हम जानते थे दर्द मिलेगा दवा के साथ.

****

आज फिर याद आ रहे हो तुम 
मेरी सांसो को मंहका रहे हो तुम.
तुम मेरा ख्वाब हो हकीकत भी हो
दूर रह कर सता रहे हो तुम. 

****

मोहब्बत को अपना खुदा मानते हैं
जो मेरा है उससे वफा मांगते हैं.
जमाने की खुशियां हो दामन में उसके
हम रब से यही बस दुआ मांगते हैं. .....    नमन 


Wednesday, 19 December 2018

२०१९ के चुनाव का सेमीफइनल


 
पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के अहंकार का परिणाम है. पिछले साढे 4 वर्षों में जिस तरह से दलितों, आदिवासी और माइनॉरिटी पर अत्याचार हुए हैं और केंद्र सरकार उस पर आंख बंद किए बैठी रही उसका परिणाम इन तीन राज्यों के बीजेपी के मुख्यमंत्रियों को भुगतना पड़ा है . मोदी जी और अमित शाह को यह समझना होगा की सिर्फ गाय और राम मंदिर के सहारे चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती॰ अपने चुनावी वादे पूरे करने मे मोदी सरकार असफल रही है और उसी का कुफ़ल इन 5 राज्यों मे उसने भुगता है॰

नोट बंदी और जीएसटी की वजह से आई आर्थिक मंदी ने छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है, नवजवान बेरोजगार है, किसान आत्महत्या कर रहा है, सरकारी विभागों मे भ्रष्टाचार अपने चरम पर है॰ हालत यह की की बिना घूस दिये न कोई पैदा हो सकता है न मर सकता है॰ बद से बदतर होते जा रहे हालत की वजह से मोदी जी की सल्तनत की तीन मजबूत ईटें खिसक गई हैं. कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता अगर पूरे हौसले से लगे रहे तो अगले कुछ महीनों में राष्ट्रीय स्तर पर एक बीजेपी विरोधी लहर बनाई जा सकती है.

 राजस्थान , मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव के नतीजे यह बताते हैं कि इन राज्यों का एससी- एसटी वोटर  कांग्रेस की तरफ मुड़ा है़. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मायावती ने बसपा के उम्मीदवार खड़े करके कांग्रेस के उम्मीदवारों को हराने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी . बसपा कांग्रेस को हराने की रणनीति लेकर इन राज्यों के चुनाव में उतरी थी. चाहे वह सीबीआई का डर हो या बीजेपी का दबाव या अन्य कोई कारण हो मायावती जी ने जानबूझकर कांग्रेस के गठबंधन के प्रस्ताव को नकारा और इतनी ज्यादा सीटों की मांग कांग्रेस से रखी कि उनके लिए उतनी सीटें दे पाना असंभव था. 

राजस्थान और मध्य प्रदेश में दलितों की इतनी दुर्दशा के बावजूद बीजेपी दलित बहुल इलाकों में अपनी पकड़ बनाए रखी है यह कांग्रेस के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. बीजेपी के तीनो सिपहसालारों को मैं बधाई देना चाहूंगा . राजस्थान और मध्यप्रदेश में वसुंधरा राजे सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान की हार में भी उनकी जीत है. 

आने वाले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि में दलितों के वोट पर भरोसा नहीं कर सकती. दलितों पर मायावती का जादू अभी भी कायम है और वे कांग्रेस को हराने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है.  अगर कांग्रेस को  2019 लोकसभा चुनावों में राजस्थान और मध्यप्रदेश में बीजेपी से आगे निकलना है तो उन्हें आदिवासी और दलित समुदाय की आकांक्षाओं को ध्यान में रखना पड़ेगा.
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों का कर्ज माफ करके कांग्रेस ने अच्छी शुरुआत की है, परंतु वह काफी नहीं है॰ राजस्थान मे गहलोत और मध्यप्रदेश मे कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाना यह दर्शाता है की चुनावी वर्ष मे राहुल गांधी सँभल- सँभल कर कदम रख रहे हैं। 

इन विधानसभा चुनाव में राजस्थान , मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम पांचों राज्यों में बीजेपी की पराजय हुई. राजस्थान , मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की विजय ने कांग्रेस को एक नई संजीवनी दी है. कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ा है. कांग्रेस नेतृत्व की असली परीक्षा अब शुरू हुयी है॰ 

किसान, मुस्लिम  और आदिवासी  वोटर ने इन चुनावों में बीजेपी के खिलाफ वोट किया . इन तीन राज्यों में मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम होने की वजह से बीजेपी हिन्दू -मुस्लिम ध्रुवीकरण मे असफल रही है . परंतु जिस वोटर ने बीजेपी को इन राज्यों में नुकसान पहुंचाया वह था किसान और नाराज एस॰सी॰, एस॰टी॰ वोटर.  विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार में सबसे प्रमुख भूमिका अगर किसी ने निभाई है तो वह है इन राज्यों का आदिवासी वोटर.  मध्य प्रदेश मैं एस.टी. के लिए रिजर्व 41 सीटों में से 26 सीटें कांग्रेस ने जीती. आदिवासी बहुल निमाण प्रभाग की 28 सीटों में से 20 सीटें कांग्रेस ने जीती और इसी ने मध्यप्रदेश में कांग्रेस की जीत का मार्ग प्रशस्त किया.
230 सीटों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के 109 विधायक और कांग्रेस के 114 विधायक चुन कर आए. 

राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी ST के लिए रिजर्व 25 सीटों में से 11सीट पर और एस. सी. के लिए रिजर्व 34 सीट में से 18 सीट पर कांग्रेस के विधायक चुने गए.  199 सीटों वाली राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस+  ने 101 सीट जीत कर सरकार बनाई. 

हिंदी भाषी राज्यों में सिर्फ छत्तीसगढ़ ही वह राज्य रहा, जहां एस.सी. और एस.टी. के साथ-साथ ओबीसी ने पूरी तरह कांग्रेस का साथ दिया. एस. टी . के लिए रिजर्व 10 सीटों में से 9 पर कांग्रेसी जीती,  वही एस.सी. के लिए रिजर्व 15 सीटों पर से 14 में कांग्रेस जीती. कुल 90 में से 68 सीट जीतकर कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में बीजेपी का सफाया कर दिया.  डॉ रमन सिंह के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ पर 15 साल से शासन करने वाली बीजेपी केवल 15 सीटों पर सिमट गई.

तेलंगाना में कुल 119 सीटों में से 88 सीट जीतकर टीआरएस ने तेलंगाना में पुनः सरकार बनाई कांग्रेस मात्र 19 सीटों पर सिमट कर रह गई जबकि बीजेपी को केवल एक सीट मिली. टीआरएस ने पिछले 5 सालों में तेलंगाना में किसानों के लिए काफी सार्थक प्रयत्न किए हैं . साथ ही राज्य में आदिवासियों का आरक्षण 6% से बढ़ाकर 10% कर दिया.  कांग्रेस की सरकारों ने तेलंगाना से सबक लेकर हिंदी भाषी क्षेत्र के राज्यों के किसानों की बेहतरी के लिए प्रयत्न करने होंगे तभी वह ग्रामीण भारत का हृदय जीत सकेगी.

जैसी की आशा थी मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट ने कांग्रेस को हराकर राज्य में सरकार बनाई. मिजोरम में हर 10 साल के बाद सरकार बदलती है. 10 साल के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर गई और मिजो नेशनल फ्रंट भारी जीत हासिल करके सरकार बनाने जा रही है.

केंद्र का राफेल घोटाला हो , मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला हो , छत्तीसगढ़ का अनाज घोटाला हो,  या राजस्थान का खान घोटाला हो .... इन व अन्य घोटालों के बावजूद कांग्रेस बीजेपी की छवि को वह नुकसान पहुंचाने में असफल रही जो वह उसे पहुंचा सकती थी.  छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का उत्पीड़न, मध्यप्रदेश में किसानों पर गोली चलवाना और राजस्थान में दलितों पर हुए अत्याचार बीजेपी पर भारी पड़े. नोटबंदी और जीएसटी की वजह से छोटे छोटे उद्योगों का जो नुकसान हुआ, बेरोजगारी बढ़ी और उसकी वजह से भी शहरी मतदाता भी कुछ हद तक कांग्रेस की तरफ मुड़ा. 

राजस्थान और मध्यप्रदेश महिलाओं पर अत्याचार के लिए कुख्यात रहे हैं, महिलाओं पर हो रहे तमाम अत्याचारों के बावजूद कांग्रेस महिलाओं की नाराजगी को वोटो में बदलने में असफल रही है. सर्वे राजस्थान में जिस तरह की बड़ी जीत कांग्रेस की दिखा रहे थे वह जीत हासिल करने में कांग्रेस असफल रही.

बीजेपी और कांग्रेस की असली परीक्षा अब शुरू होगी॰ 2019 के चुनाव ऐतिहासिक होंगे॰  बीजेपी के धनबल, बाहुबल, कॉर्पोरेट बल,  झूठ बल और संघ बल का सामना राहुल गांधी और कांग्रेस कैसे करते हैं यह देखना दिलचस्प होगा॰ बीजेपी पौने दो व्यक्तियों की पार्टी बन कर रह गयी है॰ एक अमित शाह + पौना -मोदी जी॰ 2014 के चुनावों मे निर्मित मोदी जी का राजनैतिक कद इन साढ़े चार वर्षों मे लगातार घटा है॰ पंजाब और गोवा चुनावों मे हार, मोदी और अमित शाह के अपने किले गुजरात मे येन केन प्रकारेंण सरकार बनाना, कर्नाटक मे मुंह के बल गिरना और अब 5 राज्यों मे बीजेपी का सफाया मोदी और शाह की जोड़ी पचा नहीं पाएगी। 
नमन 

Monday, 3 December 2018

शहर विरुद्ध गाँव



सरकारी आंकड़ों की माने तो आज भारत की लगभग 45% आबादी शहरों में रहती है । इस आबादी में से अधिकांश ने ग्रामीण भारत को न तो देखा है न समझा है । 

किसानो , भूमिहीनो, खेत मजदूरों और आदिवासियों की समस्याओं से यह शहरी आबादी अनभिज्ञ है और उसे भ्रम है कि यह 55% ग्रामीण आबादी शहरी आबादी द्वारा दिए जा रहे टैक्स से पोषित है और शहर पर बोझ है,  जबकि सच्चाई इसके एकदम विपरीत है । 

पहले गुजरात , कर्नाटक और अब उसके बाद हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा  चुनाव में शहरी आबादी और ग्रामीण आबादी एक दूसरे के खिलाफ मतदान करते दिखाई पड़ रहे हैं. देश की शहरी आबादी का भी 70% से अधिक अर्ध  शिक्षित है । यह अर्ध शिक्षित वर्ग टीवी समाचार और  अखबार की नज़रों से देश को देखता है.  कम पढ़ी लिखी शहरी महिलाओं जिनमें घरेलू महिलाओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा है टीवी समाचारों से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। 

शहरों में रहने वाली घरेलू महिलाएं और 35 वर्ष से कम आयु का युवक जिसने सिर्फ टीवी और अखबार में भारत को देखा है, जिसके 10वीं तक के पाठ्यक्रम में सिर्फ उसके राज्य का थोड़ा सा इतिहास पढ़ाया गया है, जिसे अपने देश का भौगोलिक ज्ञान नहीं है परंतु वह डॉक्टर , इंजीनियर और एमबीए की डिग्रियां लेकर मल्टीनेशनल कंपनियों की गुलामी कर रहा है वह भ्रम का शिकार है। 

शहरी युवा वर्ग को न तो देश की प्राचीन संस्कृति का ज्ञान है, न प्राचीन इतिहास का. शहरी युवा को न तो देश की भौगोलिक स्थितियों का ज्ञान है, न ग्रामीण भारत के अर्थतंत्र का. बहुराष्ट्रीय कंपनियां चाहती भी यही है कि हमारे देश का युवक चाकर बनकर रह जाए और अपने ही देशवासियों का शोषण करके उनके लिए धन अर्जित करता रहे।  यह वह दौर है जब बहुराष्ट्रीय  कंपनियां विदेशी निवेश के नाम पर हमारी   सरकारों के साथ मिलकर हमारे देश को लूट रही हैं और उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रही हैं । 

टीवी , व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के  दुष्प्रचार से प्रभावित होकर यही शहरी वर्ग, देश की गंगा जमुनी संस्कृति को तबाह करते हुए धार्मिक कट्टरता की तरफ बढ़ रहा है। जो हिंदू धर्म मुस्लिम शासकों और मुगलों के राज्य में खतरे में नहीं पड़ा, अंग्रेजों के राज्य में खतरे में नहीं पड़ा,  उसे आज खतरे में बताया जा रहा है जबकि देश में आज प्रजातंत्र है और देश में 100 करोड़ हिंदुओं द्वारा चुनी गई सरकार है. देश का राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,  प्रधानमंत्री से लेकर अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्री तक सारे हिंदू हैं। संघ परिवार मुसलमानों का भूत खड़ा करके हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करता है । 

मोदी सरकार ने एक तरफ कत्लखानो को टैक्स मे छूट देकर भारत को विश्व का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक बना दिया है , दूसरी तरफ संघ परिवार के संगठनो की वजह से किसान अपना पशुधन खरीद -बेंच नहीं पा रहा है। इससे किसानों को दोहरी मार पड़ी है। आज ग्रामीण भारत मे बूढ़ी गाय और बछड़ों का कोई खरीददार नहीं रह गया है अतः ये झुंड मे खुले घूम रहे हैं और फसलों का नुकसान कर रहे हैं। 

शहर में रहने वाली देश की 45% आबादी का 30% आज भी अपने गांव से जुड़ा हुआ है।  गांव में वह किसान है और शहर में मजदूर या व्यापारी। इस तरह  आप पाएंगे  कि देश की कुल आबादी का 70%  या तो गांव में रह रहा है या शहर में रहते हुए भी  गांव से जुड़ा हुआ है। 
गांव में वह दो रुपए किलो लहसुन और प्याज बेच रहा है और शहर में  रु 25 किलो  लहसुन और प्याज खरीद रहा है।  गांव में उसके गेहूं और चावल की कीमत 16 या 17 रुपए किलो मिल रही है और शहर में वह वही गेहूं और चावल 30 से 35 कहीं-कहीं रु 40 किलो के भाव में खरीद रहा है ।  

सरकारी नीतियां बड़े व्यापारियों के पक्ष में है और किसानों के खिलाफ हैं । सरदार पटेल शुगर मिल को बंद कर दिया जाता है और लगभग 75000 ग्रामीणों को विस्थापित करके  सरदार पटेल की विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति बना दी जाती है। 

विकास के नाम पर किसानों की जमीन अधिग्रहित करके कभी कौड़ियों के भाव  अदानी को पोर्ट बनाने के लिए दे दी जाती है , कभी टाटा को नैनो कार बनाने के लिए  तो कभी अंबानी को राफेल हवाई हवाई जहाज बनाने के लिए जमीन दे दी जाती है. किसानों का यह शोषण शहरी युवा वर्ग को दिखाई नहीं पड़ रहा है । 

अगर पिछले कुछ वर्षों के चुनावी समीकरणों की बात करें तो हम पाते हैं कि देश का शहर बीजेपी को और गांव विपक्ष को वोट कर रहा है।  बढ़ती हुई शहरी आबादी के साथ साथ बीजेपी का राजनीतिक कद भी बढ़ा है. एक तरफ जहां ग्रामीण भारत सरकार की किसान विरोधी नीतियों के कारण उसके खिलाफ वोट कर रहा है वहीं दूसरी तरफ शहर अपनी पूरी ताकत से बीजेपी के साथ खड़ा है। 

पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव संपन्न हो रहे हैं।  जिनमें 3 राज्यों के विधानसभाओं के वोट पड़ चुके हैं और दो के मतदान 7 दिसंबर को होने है। इन पांच राज्यों के चुनाव में भी अगर शहर पूरी तरह से बीजेपी के साथ खड़ा रहा तो बीजेपी सत्ता में वापस आ जाएगी । 

शहरी मतदाता को अपनी तरफ करने के लिए कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया , राजस्थान में पायलट और तेलंगाना में अजहरुद्दीन जैसे नेताओं को आगे किया है जिसका फायदा अगर कांग्रेस को मिला तो  कांग्रेस सत्ता में वापसी कर सकती है । राहुल गांधी खुद युवा हैं  और पिछले कुछ महीनों में उनका राजनीतिक कद बढ़ा है जिसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है ।  

इन चुनावों में अंधाधुंध धन का उपयोग और ईवीएम भी बड़ा मुद्दा है । अमित शाह ने इन चुनावों में अपनी पूरी आर्थिक ताकत झोंक दी है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ईवीएम के भटकने की जो खबरें मिली हैं, वह प्रजातंत्र के लिए एक अशुभ संदेश हैं। चुनाव के 48 घंटे बाद ईवीएम मशीन गोडाउन में नहीं पहुंची है, मतदान का प्रतिशत अलग अलग बताया जा रहा है, ईवीएम के गोडाउन में लगे सीसीटीवी कैमरे का बंद हो जाना इत्यादि ने चुनाव आयोग की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। 

पांच राज्यों के यह चुनाव 2019 के आम चुनाव की दिशा निर्धारित करेंगे। व्यापम घोटाला,  ख़ान घोटाला,  राफेल घोटाला , और नोटबंदी घोटाला आदि घोटालों से घिरी बीजेपी सरकार इन चुनावों में अपना बचाव कैसे करेगी  और कर भी पाएगी कि नहीं वह कुछ दिनों में सामने आ जाएगा। 

दूसरी तरफ विपक्ष के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। अगर इन पांच राज्यों के चुनाव में विपक्ष मजबूत होकर उभरा तो 2019 के आम चुनाव में मोदी जी की राह आसान नहीं रह जाएगी। 

2019 के आम चुनाव देश में किसान और मजदूर विरुद्ध अदानी और अंबानी होंगे। 
एक तरफ देश के कुछ दर्जन औद्योगिक घराने खड़े होंगे और दूसरी तरफ देश का किसान और मजदूर।  

नमन 

Saturday, 1 December 2018

जागो भारत जागो

- जागो भारत जागो-

धर्म- मजहब- जातियां सब काम है शैतान के
आँख के आंसू मोहब्बत, नाम है इंसान के.
चाहे माथे पर तिलक हो या निशान नमाज के
सब मुहाफिज हैं हमारे अपने हिंदुस्तान के.

 हमारे देश को धर्म और मजहब में बांट कर अंग्रेजों ने लगभग 200 साल तक हम पर शासन करते हुए हमारा आर्थिक शोषण किया.
मुगल सल्तनत के आखिरी दिनों में जहां हमारे देश का जेडीपी पूरे विश्व की जीडीपी का लगभग 24.5% था,  वह 200 साल के अंग्रेजों के शासन के बाद विश्व के जीडीपी का मात्र 2% रह गया.

 1947 में जब देश को स्वतंत्रता मिली तब हमारे देश का पहला बजट मात्र 294 करोड़ रुपए का था. 33 करोड़ की भूखी नंगी जनता,  विभाजन की त्रासदी,  राष्ट्रीय संपत्तियों का पाकिस्तान और भारत के बीच बंटवारा, 1947-48 का भारत-पाक युद्ध , 550 से अधिक स्वतंत्र रियासतों को जोड़ना, पाकिस्तान से आए करोड़ों हिंदुओं को हिंदुस्तान में बसाने और उनकी आजीविका की व्यवस्था करने जैसी सैकड़ों समस्याएं हमारे राष्ट्र निर्माताओं के सामने थी.

 अंग्रेज और उनके साथ- साथ यूरोप और अमेरिका के अन्य देश लगातार यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि भारत टूट कर बिखर जाएगा. यूरोप के कितने ही राष्ट्राध्यक्षों ने पंडित नेहरू को सलाह दी कि हिंदुस्तान अभी प्रजातंत्र के लिए तैयार नहीं है. फिर भी पंडित नेहरू और उनके मित्रों ने अपनी पूरी क्षमता देश को एक सक्षम प्रजातंत्र बनाने में लगा दी और विश्व का सर्वोत्तम संविधान 3 वर्षों से भी कम समय में हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने रचा.

 यह संविधान आधुनिक भारत की गीता भी है- रामायण भी, कुरान भी है और बाइबिल भी,  गुरु ग्रंथ साहब भी है और कबीर वाणी भी. 

 प्लानिंग कमीशन , पंचवर्षीय योजनाएं, बांधों- नहरों और सड़कों का निर्माण, बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर और इसरो जैसे संस्थानों का खड़ा करना, HAL, BHEL,  HSL, HMT, DRDO,  IIT, IIM, AIMS,  केंद्रीय विश्वविद्यालय, कृषि विश्वविद्यालय,  संस्कृत विश्वविद्यालय, योग विश्वविद्यालय जैसे हजारों सार्थक संस्थान स्वतंत्रता के बाद के पहले 4 दशकों में हम ने खड़े किए. 

 इन सब ने मिलकर भारतीय लोकतंत्र की नींव को और मजबूत किया.  इस बीच हमने चार युद्ध भी लड़े.  इन युद्धों ने हमारी अर्थव्यवस्था को अपरिमित नुकसान पहुंचाया  फिर भी हमारे राष्ट्र निर्माता अडिग रहें और देश के विकास की प्रक्रिया निरंतर जारी रही.

  यूरोपीय और अमेरिकी अर्थ विशेषज्ञों, रक्षा विशेषज्ञों और राजनेताओं के अधिकतर अनुमानों को हमने बार-बार गलत साबित किया. 

 21वीं शताब्दी के पहले दशक में जब यूरोप और अमेरिका के बाजारों में मंदी थी उद्योग बंद हो रहे थे तब भी भारत आर्थिक रूप से लगातार प्रगति कर रहा था.

 भारत की प्रगति यूरोप और अमेरिका के औद्योगिक राष्ट्रों को खल रही थी.  वे लगातार भारत की विकास के खिलाफ षड़यंत्र कर रहे थे. स्वतंत्रता के बाद पहले तीन- चार दशकों तक जो भारत यूरोप और अमेरिका में बने सामानों का उपभोक्ता था, वहां के उद्योगों को लाभ पहुंचा रहा था, वह भारत अब उनकी बराबरी में खड़ा हो गया था.

भारतीय उद्योग यूरोप और अमेरिका के उद्योगों से  प्रतिस्पर्धा करने लगे थे.  भारत 125  करोड़ उपभोक्ता वाला भारत न रहकर 125 करोड़ की आबादी वाला निर्यातक भारत हो गया था.  भारत की युवा आबादी और पढ़ा-लिखा युवक यूरोप और अमेरिका को खटकने  लगा था.

देश की तमाम सरकारों ने चाहे वह कांग्रेस की रही हो या अन्य दलों की,  हमारे नवयुवकों को जो कालांतर में इंजीनियर, डॉक्टर या साइंटिस्ट बने,  न तो भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास पढ़ाया था,  न भारत का प्राचीन इतिहास.

देश की तमाम सरकारों ने चाहे वह कांग्रेस की रही हो या अन्य दलों की,  हमारे नवयुवकों को जो कालांतर में इंजीनियर, डॉक्टर या साइंटिस्ट बने,  न तो भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास पढ़ाया था,  न भारत का प्राचीन इतिहास.

 हमने नवयुवकों की एक ऐसी पीढ़ी खड़ी कर दी थी जो तांत्रिक रूप से विश्व में सर्वश्रेष्ठ थे , परंतु अपने देश का, अपने देश की जड़ों का , अपनी संस्कृति का और अपने इतिहास का ज्ञान उन्हें न के बराबर था.  इस अज्ञान की वजह से इस पीढ़ी में राष्ट्राभिमान की भी कमी आई. 

 स्थितियां यहां तक बिगड़ी कि हमारे देश के अर्थ तज्ञ , हमारे देश के इतिहासकार, हमारे देश के वैज्ञानिक  या हमारे राष्ट्र निर्माता कुछ भी कहें परंतु जब तक उनकी बातों की संस्तुति कोई यूरोप या अमेरिका का विद्वान नहीं कर देता तब तक हम अपने वैज्ञानिकों, अर्थतज्ञ,  इतिहासकारों या राष्ट्र निर्माताओं को सही नहीं मानते.

 स्वतंत्रता के बाद के पांच दशकों में हमने यूरोप और अमेरिका के जिन अर्थतज्ञ , इतिहासकारों  और राजनेताओं  को बार- बार गलत साबित कर इतनी आर्थिक और वैज्ञानिक प्रगति की थी,  आज हम उन्हीं की तरफ देख रहे हैं कि वह हमारा  मार्गदर्शन करें.

 हमारे देश की समस्याएं , हमारी संस्कृति , हमारी भौगोलिक स्थितियां,   यूरोप और अमेरिका से अलग हैं,  अतः यूरोप और अमेरिका का अंधानुकरण करके हम अपने देश को पतन के गर्त में ले जायेंगे यह बात आज के युवाओं को समझ लेनी चाहिए.

 खैर मैं अपनी बात पर लौटता हूँ.  भारत  की अविश्वसनीय आर्थिक और वैज्ञानिक  प्रगति ने यूरोप और अमेरिका के राजनेताओं के कान खड़े कर दिए और उन्होंने एक बार फिर भारत के खिलाफ षड़यंत्र रचना शुरू किया.

 125 करोड़ उपभोक्ताओं वाला भारत  यूरोप और अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ा बाजार है .

भारत कई दर्जन भाषाओं , संस्कृतियों  और आधा दर्जन धर्म के लोगों का समूह है. यूरोप और अमेरिका ने भारत के स्वार्थी राजनेताओं,  तथाकथित बुद्धिजीवियों और पत्रकारों को पैसे का लालच देकर देश में धर्म, जाति और भाषा के नाम पर पुन: विष के बीज रोपने शुरू कर दिए, जिसका रिजल्ट अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है.  यूरोप और अमेरिका चाहते हैं कि भारत में राजनीतिक अस्थिरता आए,  धार्मिक और जातीय संघर्ष हों, भारत की औद्योगिक और आर्थिक प्रगति रुके ताकि भारत की यूरोप और अमेरिका पर निर्भरता बढे और भारत यूरोप और अमेरिका में बने माल का बाजार फिर से बन सके.

 भारत की जनता और विशेषकर भारत के नवयुवकों की  यह जिम्मेदारी बनती है कि वह यूरोप और अमेरिका के इस षडयंत्र  के शिकार न बने.   भारत की धार्मिक , जातिगत , भाषाई और सांस्कृतिक विविधता ही भारत की ताकत रही है.  इसी विविधता में एकता की बात हम पिछले 7 दशकों से करते आए हैं.  

 यूरोप और अमेरिका हमारे देश में जिस धार्मिक और जातीय अतिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं वह  कालांतर में आतंकवाद में परिवर्तित हो सकता है.  यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि आतंकवाद और आतंकवादी हमेशा अपने ही धर्म के लोगों के विनाश का कारण बनता है. 

 पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान, सिरिया, इराक और अरब देशों तक फैले इस्लामिक आतंकवाद में  99% जानें मुसलमानों की ही गई है .  हजारों मस्जिदे, स्कूल , संग्रहालय और अस्पताल तोड़े गए हैं. 

हम अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान का ही उदाहरण लें तो पाएंगे कि आतंकवादी वहां स्कूलों में घुसकर एक एक बार में 200-200 बच्चों की जान ले ले रहे हैं,  मस्जिदों में बम विस्फोट करके एक एक बार में सैकड़ों नमाजियों की हत्या कर दी जा रही है , वायुसेना और नौसेना अड्डों पर घुसकर उनके शस्त्रागारों में आग लगा दी जा रही है,  राजनेताओं को सड़कों पर मार दिया जा रहा है.  कहने का मतलब है कि पाकिस्तान से लेकर अरब देशों तक मुसलमान ही मुसलमान को ही मार रहा है, किसी दूसरे को नहीं.

 हम सब जानते हैं कि इस इस्लामिक आतंकवाद की जड़ में अमेरिका और यूरोप है.  मुस्लिम देश तबाह हो रहे हैं और यूरोप एवं अमेरिका व्यापार कर रहे हैं.

 भारत में यूरोप और अमेरिका इसी अतिवाद की जड़े रोपने में लगे हुए हैं.
 125 करोड़ की आबादी वाला भारत उन्हें ललचा रहा है.  भारत में पनपता हुआ अतिवाद  अगर आतंकवाद में परिणित हो गया  तो यूरोप और अमेरिका को एक बहुत बड़ा बाजार भारत में मिल जाएगा.
याद रखिए आतंकवाद दुनिया का सबसे बड़ा व्यवसाय है. 

भारत के नौजवान पीढ़ी को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह धार्मिक अतिवाद और जातिवाद के झांसे में न आए और राष्ट्र निर्माण के लिए लगातार प्रयत्नशील रहे.

आज देश के सामने दो सबसे बड़ी चुनौती है, एक धर्मांधता और दूसरा भ्रष्टाचार.
भ्रष्टाचार मे लिप्त राजनेता अपनी अक्षमताओं से आपका ध्यान हटाने के लिए आपको धर्म की अफीम खिला रहे हैं.
धर्म के संगठित गिरोह पूरे देश में सक्रिय हैं.
टीवी चैनलों पर लगातार जहर बोया जा रहा है. नफरत का बाजार गर्म है और प्रेम अस्पृष्य हो गया है.
गंदा है पर धंधा है ए. 

जागो भारत जागो!

Monday, 5 November 2018



                        देश के नवनिर्माण में कांग्रेस का अवदान


हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान से 15 अगस्त 1947 को भारत में स्वतंत्रता का नया सूर्य उदय हुआ।  १८५७ से १९४७ तक के ९० वर्ष के संघर्ष के बाद हमें स्वतंत्रता मिली।  

कंठ भलेहों कोटि-कोटि तेरा स्वर उनमें गूंजा

हथकड़ियों को पहन राष्ट्र ने पढ़ी क्रांति की पूजा।  


सदियों से गुलामी की त्रासदी झेलते आए भारत के लगभग 35 करोड अवाम ने अपने सुंदर भविष्य के सपने देखने शुरु किए। 

गुलामी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जर्जर बना दिया था। अंग्रेजों ने हमारे उद्योग नष्ट कर दिए और हमारा लगभग 200 वर्षों तक आर्थिक शोषण किया।  1947 आते आते अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में कभी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत का हिस्सा मात्र 2% रह गया था जो मुगल काल में लगभग 25% था।

पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि सक्षम नेताओं के कंधो पर स्वतंत्र भारत के पुनर्निर्माण का गुरुतर भार आ पड़ा था.

एक तरफ डॉ. राजेंद्र प्रसाद,डॉ. भीमराव  आंबेडकर ,पंडित नेहरू और संविधान सभा के उनके सहयोगी सदस्य भारत के संविधान के निर्माण में रात दिन एक कर रहे थे, वही दूसरी तरफ सरदार पटेल और पंडित नेहरू लगभग 555 स्वतंत्र रियासतों को जोड़कर भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने की दिशा में काम कर रहे थे।
 
कांग्रेस के सामने न केवल भारतीय रियासतों को जोड़ने का गुरुतर कार्य था बल्कि पांडिचेरी और गोवा जैसे फ्रांस और पुर्तगाल शासित राज्यों को आज़ाद करा कर भारत में शामिल करने का भी था।

स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारतीय सेना जहाँ एक तरफ पंजाब में हो रहे हिन्दू –मुस्लिम कत्लेआम से निपट रही थी वहीँ उसे कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले के कारण कश्मीर में जाकर लड़ना पड़ा।  

कांग्रेस के नेता विभिन्न मोर्चों पर लगातार दिन-रात श्रम कर रहे थे ताकि एक मजबूत और सक्षम भारत की नींव रख सकें, वहीं आरएसएस जैसे संगठन देश में भय ,भ्रम और धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देने में लगे थे। 

कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित कबायलियों से लड़ना और उन्हें पीछे धकेलना,पाकिस्तान से भारत आए लाखों हिंदू और सिख शरणार्थियों को हिंदुस्तान में बसाना उनके रहने खाने और सुरक्षा की व्यवस्था करना,संविधान निर्माण में लगातार ढील ना आने देना और निश्चित समय में संविधान बना कर देश को समर्पित करना जैसे कामों  के लिए हम संविधान सभा के सदस्यों और तत्कालीन भारत के निर्माताओं को जितना भी श्रेय दें वह कम ही होगा। 

चुनौती सिर्फ संविधान बनाने की नहीं थी बल्कि पूरे के पूरे संवैधानिक ढांचे को खड़ा करने की थी,जो संविधान को लागू कर सके।   योजना आयोगन्यायपालिकाकार्यपालिकाकेंद्र -राज्य संबंध, विदेश नीति आदि कितने ही काम हमारे राष्ट्र निर्माताओं के सामने थे। 

 इसी बीच सांप्रदायिक शक्तियों ने देश की पीठ में वह खंजर भोंका जिसका दर्द आज तक ताजा है।  इन कायर ताकतों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तब हत्या कर दी जब देश को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। 

महात्मा गांधी के हत्या के पीछे उनकी मंशा देश को सांप्रदायिक आधार पर बांट कर उस के टुकड़े-टुकड़े करने की थी।  परंतु भारतीय जनता ने उन सांप्रदायिक ताकतों का मुंहतोड़ जवाब दिया और वह पूरी क्षमता से कांग्रेस के पीछे खड़ी रही। 

महात्मा गांधी की हत्या एक व्यक्ति की हत्या नहीं थीवह हत्या थी सत्य कीप्रेम कीमानवता की।  ईश्वर उन्हें माफ करना क्योंकि उन्हें खुद नहीं पता था कि उन्होंने देश पर कितनी बड़ी आपदा लाई थी। 

राष्ट्रपिता की हत्या के बाद उनके हत्यारों का आरएसएस का संबंध होने के लिए देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।  

भारत की स्वतंत्रता के बाद भारत का पहला सालाना बजट मात्र 294 करोड़ का था। बिखरे हुए हिंदुस्तान को समेटकर भूखगरीबी और अशिक्षा जैसी समस्याओं से लड़ते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने का काम कांग्रेस ने शुरु किया। 
  
२ वर्ष ११ महीने में संविधान सभा ने भारत को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संविधान दिया जिसने भारत में प्रजातंत्र की नींव को हमेशा के लिए सुदृढ कर दिया।

गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर कांग्रेस ने देश की सदियों से शोषित और प्रताड़ित जनता को 'प्रजातंत्र' नाम का नया धर्म दिया। 

26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान को देश को समर्पित करते हुए कांग्रेस ने देश की जनता को देश का राजा घोषित किया। 

यहां एक बात जो गौर करने लायक है वह यह है कि संविधान सभा में अधिकांश सदस्य कांग्रेस के थे।  कांग्रेस अगर चाहती तो देश में एक पार्टी वाले शासन की नींव रख सकती थी।  ऐसा संविधान बना सकती थी जिस तरह का संविधान सोवियत रूस या हमारे पड़ोसी चीन में है। परंतु कांग्रेस के नेताओं में सत्ता के प्रति रंचमात्र भी मोह नहीं था। उन्होंने देश कि सत्ता आम आदमी के हाथ में सौंप दी। 


डॉ राजेंद्र प्रसाद,पं. नेहरु,डॉ भीमराव आंबेडकर,सरदार पटेल,मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि संविधान सभा के सदस्यों को बार बार प्रणाम करते हुए किसी कवि की यह पंक्तियाँ बरबस याद आ रही हैं..... 

"तुमने दिया देश को जीवन देश तुम्हे क्या देगा
अपनी आग तेज रखने को नाम तुम्हारा लेगा"

1950 में सरदार पटेल की लंबी बीमारी से मृत्यु के बाद पंडित नेहरू अकेले पड़ गए थे। फिर भी राष्ट्र को जोड़ने की उनकी यात्रा लगातार जारी थी। 

एक तरफ आरएसएस और जनसंघ अल्पसंख्यकों के खिलाफ विष उगल रहे थे, दूसरी तरफ विघटनकारी सांप्रदायिक शक्तियों से लड़ते हुए कांग्रेस लगातार देश को जोड़ने का काम कर रही थी।  

भारत का लगातार 200 साल शोषण करने के बाद अंग्रेज जाते-जाते अपने पीछे एक भूखा और नंगा भारत छोड़ गए थे जहां लगभग 50% आबादी के पास ना तो 2 जून की रोटी थी न 2 जोडा कपड़ा। 
पंडित नेहरू और कांग्रेस ने कभी इन परिस्थितियों का रोना नहीं रोया और नए और समृद्ध भारत के निर्माण में रात दिन एक कर दिया। 

हम सब इतिहास पढ़ते हैंकुछ लोग इतिहास लिखते भी हैं , पतन्तु महान वे होते हैं जी इतिहास बनाते हैं। 
पंडित नेहरू ने न केवल इतिहास पढ़ा, इतिहास लिखा, बल्कि इतिहास बनाया भी । 

सऊदी अरब की यात्रा के दौरान पंडित नेहरू को "रसूल- अस - सलाम" यानी शांति का संदेश वाहक कह कर पुकारा गया था। उर्दू में यह शब्द पैगंबर मोहम्मद साहब के लिए भी प्रयुक्त होता है। 
प्रसिद्ध शायर रईस अमरोहवी का एक मिसरा कराची से निकलने वाले अखबार डॉन में उस समय प्रकाशित हुआ था,

" जप रहे माला एक हिंदू की अरब
बरहमनजादे में शान ए दिलबरी ऐसी तो हो। 
हिकमत ए पंडित जवाहरलाल नेहरु की कसम
मर मिटे इस्लाम जिस पर काफिरी ऐसी तो हो।"

मुझे बरबस बिनोवा भावे जी का, The Nehru Legacy - Democratic Socialism नामक लेख याद आ जाता है जिसमें उन्होंने लिखा है कि,
" I think of Asoka the Great when I ponder over the life and work of Nehru."

अपने अगले पैराग्राफ में बिनोवा भावे लिखते हैं,

" Nehru had a mind as large as this universe."

इसी पैराग्राफ में आगे वे लिखते हैं,

" Verily I say, Nehru has mingled with the people of India and will live with them forever."

देश के सामने तमाम समस्याएं सर उठाए खड़ी थी. उसी दौर में किसी शायर ने कहा,

"अभी तो सुबह के माथे का रंग काला है
अभी फरेब न खाओ बड़ा अंधेरा है"




                                    -विदेश नीति -

यह पंडित नेहरू की प्रभावी विदेश नीति की विजय थी कि 28 मई 1956 को फ्रांस के आधिपत्य वाले कारिकल, माहे  व पांडिचेरी आदि को स्वतंत्र करा कर पंडित नेहरु ने उन्हें भारत का अविभाज्य अंग बना दिया.
पंडित नेहरु ने अपनी सेना भेज कर 6 जून 1962 को आधिकारिक रूप से पुर्तगाल शासित गोवा,दमन , दीव आदि का भारत में विलीनीकरण कर लिया। 

नाटो और वारसा संधियों से जुड़े देशों ने कोल्ड वार के ज़माने में पूरे विश्व को दो भागों में बाँट दिया था. पंडित नेहरु ने युगोस्लाविया के प्रेसिडेंट टीटो, मिस्र के प्रसीडेंट नासेर, इंडोनेशिया के प्रेसिडेंट सुकर्णो और घाना के प्रेसिडेंट न्कृमाह के साथ मिल कर गुट निरपेक्ष देशों के संगठन की नींव रखी. लगभग १२० देश आज इस संगठन के सदस्य हैं और इस संगठन ने भारत की विदेश नीति को नयी दिशा दी.


                                    -औद्योगिक विकास और हरित क्रांति-

 योजना आयोग की नींव , पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत, भाखड़ा और रिहंद जैसे ३२०० से ज्यादा बांधों और नहरों के निर्माण का कार्य,भारत की नवरत्न कंपनियों की नींव इसी काल में रखी गईजिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दी . भूमि प्रबंधन , सहकारिता आन्दोलन और कृषि विश्वविद्यालयों की नींव भी इसी काल में रखी गयी.

IIT,IIM,AIIMS,HAL,BHEL,HMT,ISRO,BARC,TAPS,HSL,IFCO जैसी संस्थाओ की नींव भी इसी काल में रखी गयी.

15 मार्च 1950 को योजना आयोग की स्थापना की गई। देश के आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का खाका तैयार करने का काम शुरू हुआ।  स्वतंत्रता से आज तक भारत की चहुमुखी आर्थिक , औद्योगिक , कृषि , शैक्षणिक और वैज्ञानिक प्रगति का आधार यही पंचवर्षीय योजनाएं  बनी। 

यह कांग्रेस की आर्थिक नीतियों का ही परिणाम है कि
स्वतंत्र भारत का पहला वार्षिक बजट जहां मात्र 294 करोड रुपए का था,वही आज हमारा वार्षिक बजट 20 लाख करोड रुपए के ऊपर पहुंच गया है।  यह सरकार की दूरदृष्टि और भारतीय जनता के अथक परिश्रम से ही संभव हो पाया है। 

स्वतंत्रता से पहले  1946 -1947 में जहां देश की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 62. 30 रू मात्र थी और सकल घरेलु उत्पाद मात्र 2524  करोड़ रू  था।  

वही 2014 आते-आते जहाँ प्रति व्यक्ति आय लगभग 80,000 रू प्रतिवर्ष और सकल घरेलु उत्पाद लगभग 1,13,550.73 अरब रू तक पहुंच गया है। 

60 और 70 के दशक में देश में सिंचाई की सुविधाओं का सर्वथा अभाव था।  किसान सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर करता था।   बड़े बड़े बांधों, नहरों के जाल से पूरे देश को जोड़ने का काम कांग्रेस की सरकारों ने किया।  जिससे सिंचित क्षेत्र कई गुना बढ़ गया। 

स्वतंत्रता के बाद जहां हमारी आबादी लगभग 4 गुना बढ़ी है वही खाद्यान्न उत्पादन लगभग 5 गुना से ज्यादा बढ़ा है।

1947- 48 में जो भारत अपनी 35 करोड़ की आबादी को 2 जून की रोटी उपलब्ध नहीं करा पाता था,वह भारत आज अपनी 130 करोड़ की आबादी को पर्याप्त खाद्यान्न मुहैया करने के बाद लाखों करोड़ रुपए का खाद्यान्न निर्यात करता है।  यह पंचवर्षीय योजनाओं और हरित क्रांति की सफलता का एक उत्तम उदाहरण है।

2013 - 14 तक भारत कृषि उत्पादों का विश्व का छठवां सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है.
देश की कुल जीडीपी का 13.7 % कृषि क्षेत्र से आता है. देश के कुल रोजगार का लगभग 50% रोजगार कृषि क्षेत्र में उपलब्ध होता है.
                                       
                                                       

                               स्वास्थ्य

आर्थिक प्रगति और बेहतर स्वास्थ्य प्रबंधन की वजह से भारतीयों की औसत आयु लगभग 2 गुनी हो गई है।  पूरे देश में सरकारी अस्पतालो का जाल बिछाने का काम कांग्रेस ने अपने ७० साल के कार्यकाल में किया। 
1947 में भारतीयों की औसत आयु मात्र  32 वर्ष 6 महीने थी। 

आज भारतीय पुरुष की औसत उम्र 64 वर्ष 2 महीने और भारतीय स्त्री की औसत उम्र 68 वर्ष 5 महीने हो गई। 
देश में ६०५ जिला अस्पताल और ३०,००० से ज्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले गए। 

सरकारी क्षेत्र में आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस और टाटा कैंसर अस्पताल जैसे अस्पताल इसी काल में खुले हैं.
                                             

                                      बिज़ली उत्पादन

स्वतंत्रता के बाद से वर्ष 2014 तक भारत ने अपनी बिजली की उत्पादन क्षमता में लगभग 1784 गुना की वृद्धि की है।  

स्वतंत्रता के समय हमारे देश की बिजली उत्पादन क्षमता केवल 1362 मेगावाट थी वह 2014 में  बढ़कर 2,43,000 मेगावाट हो चुकी है।  

स्वतंत्रता के समय देश के मात्र ३,000 गांव में बिजली के कनेक्शन उपलब्ध थे।  

2014 आते आते देश के 5,50,000 से अधिक गांवों में बिजली के कनेक्शन दिए जा चुके हैं.

आज भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा बिजली उत्पादक देश है।  

1947 में जहां प्रति व्यक्ति 16.3 किलो वाट बिजली उपलब्ध थी ,
वहां आज प्रति व्यक्ति 1010 किलो वाट बिजली उपलब्ध है। 

तेजी से बढ़ रहे हैं उद्योगीकरण और शहरीकरण से बिजली की खपत कई गुना बढ़ी है.




                                              शिक्षा

स्वतंत्रता के बाद मौलाना आज़ाद के कुशल नेतृत्व में  देश ने शिक्षा के  लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए।  स्वतंत्रता के समय देश में जहां केवल 4 करोड लोग शिक्षित थे 2011 आते-आते यह संख्या 96 करोड़ तक पहुंच गई।

1956 में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की स्थापना हुई और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी तेजी से कार्य हुआ। 

 1947 में देश में मात्र 2लाख प्राइमरी स्कूल थे,2014 में देश में 20 लाख से ज्यादा प्राइमरी स्कूल हैं। 

1947 में जहां साक्षरता की दर मात्र 12% थी,वही  2014 में 74 प्रतिशत पर पहुंच गई है। 
1950 में देश में मात्र 20 विश्वविद्यालय थे।  

आज देश में 45 सेंट्रल विश्वविद्यालय, 367 स्टेट विश्वविद्यालय और 123 डीम्ड विश्वविद्यालय हैं।

आज 23 IIT,31 NIT,23 IIIT,7 AIIMS के साथ-साथ 10,000 से ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज और लगभग 450 मेडिकल कॉलेज  देश में है, जो कांग्रेस की नीतियों और शिक्षा के प्रति कांग्रेस के समर्पण  का परिणाम है।

                               
                       युद्ध, उसके परिणाम और भारतीय सेना की गौरव गाथा

स्वतंत्रता के बाद हुए 4 युद्धों  ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी थी।  1947,1962 ,1965 और 1971 के 4 युद्ध भारत ने अपनी स्वतंत्रता के पहले 24 वर्षों में लडे़।   इन 4 युद्धों ने  देश के पुनर्निर्माण को अत्यधिक क्षति पहुंचाई। इससे विकास की गति प्रभावित हुई। 

जब देश में आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए संसाधनों की अत्यंत आवश्यकता थी उस समय इन युद्धों ने भारत को सेना की जरूरतों के लिए हथियार और संसाधन खरीदने पर मजबूर किया।

 1965 में जब पाकिस्तान ने जबरन युद्ध भारत पर लादा और अमेरिका ने भारत को गेहूं और अन्य खाद्यान्न देने से मना कर दिया ,तब हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने "जय जवान- जय किसान" का नारा देते हुए विश्व की महाशक्तियों को ललकारा।  

भारतीय सेनाओं ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए ना केवल पाकिस्तान को युद्ध में बुरी तरह पछाड़ा बल्कि देश के किसानों ने देश को खाद्यान्न के बारे में आत्मनिर्भर बनाने का जो व्रत लिया,उसकी परिणति यह हुई कि 1974-75 आते-आते भारत खाद्यान्न के उत्पादन के बारे में आत्मनिर्भर हो चुका था। 

1971 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को वह शिकस्त दी कि तब से आज तक पाकिस्तान भारत से आमने - सामने की लड़ाई की हिम्मत नहीं कर सका। 

सिर्फ 15 दिन के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए और पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बना कर पाकिस्तान से हमेशा के लिए अलग कर दिया।  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार हुआ था कि किसी देश ने दूसरे देश की सेना के 93000 सैनिक गिरफ्तार किए हों। 

युद्ध के बाद में शिमला समझौते में इंदिरा गांधी ने जुल्फिकार अली भुट्टो से यह सुनिश्चित करा लिया कि इसके बाद भारत पाक संबंधों में किसी तीसरे देश का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा और न तो संयुक्त राष्ट्र संघ ही हमारे आपसी मसलों में कोई हस्तक्षेप करेगा।  शिमला समझौता भारतीय कूटनीति की एक बहुत बड़ी जीत थी।

भारत ने अपनी सेना के आधुनिकीकरण का काम लगातार जारी रखा था। आज भारतीय वायुसेना विश्व की सर्वश्रेष्ठ वायु सेनाओं में से एक है।

आज भारतीय नौसेना अपने लिए फ्रिगेट, डिस्ट्रॉयर जहाजों से लेकर विमान वाहक जहाज, पनडुब्बियां और परमाणु पनडुब्बी तक खुद बना रही है।

शुरुआती दिनों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने भारत में नेट विमान, किरण जेट ट्रेनर विमान,  चेतक और ध्रुव हेलीकॉप्टर आदि बनाने में सफलता हासिल की।
 
आज हम भारत में विकसित किया गया तेजस विमान बना रहे हैं जो विश्व के सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू विमानों में से एक है।

भारतीय सेना के लिए अर्जुन टैंक, 30 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक मार करने वाली धनुष तोप,  पृथ्वी, नाग, त्रिशूल, अग्नि जैसी मिसाइलें आज भारत खुद बना रहा है।

आज हमारे पास परमाणु हथियार ले जाने वाले विमान और मिसाइल हैं।

आज अगर हमारी सेना विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में से एक है और देश की सुरक्षा के लिए ज्यादा सचेत और सक्षम हैं तो इसका सारा श्रेय कांग्रेस की सरकारों को जाता है जिन्होंने आर्थिक संसाधनों की कमी के बावजूद भारतीय सेना के लिए संसाधन मुहैया कराए।


 अक्सर हमसे यह प्रश्न पूछा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान, जर्मनी, चीन और भारत आदि का पुनः निर्माण एक ही समय शुरू हुआ लेकिन भारत बाकी अन्य देशों से पीछे कैसे रह गया। 
यहां तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण है।  

पहली यह कि, द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान और जर्मनी के हुए विनाश के बावजूद जर्मनी और जापान में उद्योगों के लिए पर्याप्त तंत्र-ज्ञान मौजूद था, क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के समय वे दोनों देश एक विकसित देश थे और कई मामलों में यूरोप और अमेरिका से आगे थे।  अतः जापान और जर्मनी के पुनर्निर्माण के समय इन दो देशों के पास आर्थिक अभाव तो था लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि और तंत्रज्ञान की कहीं कोई कमी नहीं थी। 

दूसरा महत्वपूर्ण अंतर था "राष्ट्रप्रेम"

आचार्य विनोबा भावे ने धूलिया में दिए गए अपने एक वक्तव्य में कहा था , जिस समय जर्मनी द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा रहा था और आक्रांता था, गलती पर था फिर भी संयुक्त जर्मनी की कुल 6 करोड़ आबादी में से 3 करोड़ आबादी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल थी। 

ठीक उसी समय भारत अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था फिर भी  भारत की लगभग 35 करोड़ आबादी में से तीन लाख से भी कम लोग स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे।  यह बताता है की भारत में प्रति १००० व्यक्ति में से १ व्यक्ति से भी कम लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रीय भाग लिया। 

यह आंकड़े बताते हैं कि हम भारतीयों में देशप्रेम की कितनी कमी रही है। 

आचार्य विनोबा भावे जी ने कहा था कि अगर स्वतंत्रता आंदोलन में भारत के हर परिवार का एक व्यक्ति शहीद हुआ होता या शामिल हुआ होता तो भारत जर्मनी या जापान से ज्यादा विकसित  राष्ट्र होता। 

राष्ट्रप्रेम के प्रति यह कमी स्वतंत्रता आंदोलन में भी लोगों को दिखाई पड़ रही थी, जब आरएसएस जैसे संगठन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध कर रहे थे। 

एक तरफ कांग्रेस महात्मा गांधी के नेतृत्व में "अंग्रेजों भारत छोड़ो" और "करो या मरो"  का नारा लगाकर देश से अंग्रेजों को भगाने के लिए प्रयत्नशील थी , कुर्बानियां दे रही थी, हमारे स्वतंत्र सेनानी लाठी और गोलियां खा रहे थे, उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत छोडो आंदोलन का विरोध कर रहा था और पूरे देश में जगह-जगह शिविर लगाकर भारतीय युवकों को अंग्रेजों की सेना में शामिल होने की सलाह दे रहा था, ताकि वे बर्मा के बॉर्डर पर जाकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से टक्कर ले सकें।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेता जो  मुस्लिम लीग कि बंगाल सरकार में मंत्री थे, 1946 में बंगाल में बंगाल विभाजन के पक्ष में मतदान करा रहे थे। संघ के स्वयंसेवक पूरे देश में यह प्रचार करते थे कि अंग्रेज उनके दुश्मन नहीं है उनके दुश्मन मुसलमान हैं। 

अपनी इसी प्रवृत्ति को जारी रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वतंत्रता के बाद भी स्वतंत्र भारत की पहली सरकार का विरोध जारी रखा।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देखरेख और मार्गदर्शन में जनसंघ की स्थापना हुई जिसने 1952 के प्रथम चुनाव में भाग लिया।  इसके नेता डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उनके सहयोगी हमेशा कांग्रेस की नीतियों का विरोध करते रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अपने कैडरों और समर्थकों के बीच सावधानीपूर्वक बोए गए सांप्रदायिक भावनाओं को देखते हुए ही सुप्रसिद्ध पत्रकार कृष्ण भाटिया ने 1971 में लिखा, "पिछले 30 वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में हुए कुछ सबसे बुरे दंगों के पीछे रही है"


भाजपा नेताओं की 'ट्यूब लाइट' देर से जलती है-

 विपक्षी दलों विशेष करके तत्कालीन जनसंघ और अब बीजेपी द्वारा सरकार की हर नीति का विरोध करने की परंपरा की वजह से देश की आर्थिक प्रगति में लगातार अड़चनें आई। 

1969 में जनसंघ ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवी पर्स रोकने का विरोध किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1970 के दशक में कांग्रेस सरकार की परिवार नियोजन योजनाओं का विरोध किया।  

एक तरफ चीन जैसे देश उस समय एक परिवार एक बच्चे की बात कर रहे थे, दूसरी तरफ हमारे देश की जनसंघ जैसी पार्टियां "बस दो या तीन बच्चे- होते हैं घर में अच्छे" जैसे कांग्रेस के नारे के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रही थी।
उसका परिणाम वह यह हुआ कि जहां चीन अपनी जनसंख्या को रोकने में कामयाब रहा वहीं भारत में भयंकर जनसंख्या विस्फोट हुआ।

1977 के आम चुनाव में कांग्रेस के हारने के बाद किसी राष्ट्रीय दल में यह हिम्मत नहीं पड़ी कि वह परिवार नियोजन के कार्यक्रम को पूरी हिम्मत से आगे ले जा सके।  आज अगर हमारे देश की आबादी 130 करोड़ है तो उसका सारा श्रेय जनसंघ जैसी पार्टी को जाता है।

1970 के परिवार नियोजन कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया होता तो आज हमारी आबादी 100 करोड़ से कम  होती।  हर परिवार के पास अपना घर होता, हर आदमी के पास नौकरी होती और कोई बेकार न होता। 30 करोड़ उपभोक्ता कम होते तो हमारा एक्सपोर्ट आज का दुगुना होता. परंतु जनसंघ की राजनीति में हमें पीछे धकेल दिया।



स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में जब राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटर लाने की बात की तो, अटल बिहारी बाजपेई सहित BJP के सारे नेता संसद पर बैलगाड़ी मोर्चा ले कर गए।   पूरे देश में संसद से सड़क तक उसका विरोध किया गया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और सैम पिट्रोदा टेलीकम्यूनिकेशन क्रांति की बातें कर रहे थे।  सैम पित्रोदा ने कहा कि अगर भारत सरकार उन्हें सहयोग दें तो वह कुछ ही वर्षों में भारत के गांव के एक-एक पेड़ पर टेलीफोन टांग देंगे।  उस समय आडवाणी जी सहित सारे विपक्ष के नेताओं ने न केवल उनकी योजनाओं का विरोध किया बल्कि सैम पित्रोदा का जगह -जगह मजाक उड़ाया।

1989 के आम चुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद देश में कंप्यूटर क्रांति और टेलीकम्यूनिकेशन क्रांति की योजनाएं धरी की धरी रह गई और चीन आदि देश हम से काफी आगे निकल गए। 

बाद में नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री काल में पुनः कांग्रेस ने देश में कंप्यूटराइजेशन और टेली कम्युनिकेशन के क्षेत्र में तेजी से काम किया. परंतु तब तक हम अन्य देशों से काफी पिछड़ चुके थे।

बाद में 1998- 99 में BJP के नेताओं की ट्यूबलाइट जली और प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल बिहारी बाजपेई और प्रमोद महाजन जैसे नेताओं ने कंप्यूटराइजेशन और टेलीकम्यूनिकेशन के क्षेत्र में किए गए कांग्रेस के काम की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

वर्तमान में देखें तो 2004 से 2014 तक एफडीआई, मनरेगा, जीएसटी, आधार जैसी योजनाओं का लगातार विरोध करने के बाद 2014 में प्रधानमंत्री बनने पर मोदी जी की ट्यूबलाइट अचानक जल जाती है और वह इन्हीं योजनाओं के प्रशंसा करने लगते हैं।

वित्त मंत्री जेटली जी संसद में स्वयं कबूल करते हैं कि जीएसटी नहीं लागू होने की वजह से देश को लगभग ढाई लाख करोड़ प्रतिवर्ष का नुकसान हुआ, यानी भारतीय जनता पार्टी के विरोध की वजह से देश को लगभग 20 लाख करोड रुपए का नुकसान उठाना पड़ा।

जो मोदी जी अपने मुख्यमंत्री काल में आधार कार्ड का लगातार विरोध कर रहे थे वह आज देश की सारी योजनाओं को आधार से जोड़ने में लगे हैं।

वर्ष 2005 में डॉ मनमोहन सिंह के कोयला खानों के नीलामी द्वारा आवंटन का विरोध करने वाले बीजेपी नेता सत्ता में आते ही कोयला खानों की नीलामी करते हैं। 

यह तमाम बातें बताती हैं और साबित करती हैं कि बीजेपी नेताओं में दूर दृष्टि का लगातार अभाव रहा है। 
उन्हें बातें 10 से 15 साल बाद समझ में आती है, या आम आदमी की भाषा में कहें तो उनकी ट्यूबलाइट देर से जलती है।


 "यही है मेरा देश मुझको यकीन है
धरा पर अगर स्वर्ग है तो यहीं है"

 यह सच है कि महात्मा गांधी की दूरदर्शिता और अंग्रेजो के मनोविज्ञान की समझ ने हमें बहुत कम संघर्ष और बलिदान के बावजूद आजादी दिला दी थी।
मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा था,

" जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है
वह नर नहीं, है पशु निरा और मृतक के समान है"

स्वाभिमान और देश के प्रति अभिमान की यही कमी हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी से जर्मनी के 2015 दौरे में यह कहलवा देती है की,

" एक समय था जब लोग कहते थे पता नहीं क्या पाप किया था जो हिंदुस्तान में पैदा हो गए"

चीन दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा की, “ पहले भारत की पहचान Scam India की थी.”

ऐसे वक्तव्य यह साबित करते हैं कि हम अपने देश से कितना प्यार करते हैं। इन प्रवृतियों ने हमेशा देश को कमजोर किया है।

2015- 16 में भारत के रक्षा मंत्री रहे मनोहर पर्रिकर जी ने यह कह कर देश पर कुर्बान हुए उन हजारों सैनिकों का अपमान किया जिन्होंने 1947-48, 1962,1971, और करगिल के युद्ध में वीरता की मिसाल कायम की कि "हमारे यहां आने के पहले सेना कमजोर थी उसमें वह जज्बा नहीं था जो अब है"

यही वजह है कि लौह पुरुष सरदार पटेल की मूर्ति चीन में बनी है, भारतीय प्रधानमंत्री बिन बुलाए बिरयानी खाने पाकिस्तान चले जा रहे हैं, चीन के राष्ट्राध्यक्ष को आप झूला झुलाते रहते हैं और डोकलाम में उनकी फौजें घुस आती हैं।

                                
                                 हमें भारतीय होने पर गर्व है-


हमें गर्व होना चाहिए कि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में भारत 1974 में पोखरण बम विस्फोट करके विश्व की प्रथम पांच परमाणु शक्तियों में शामिल हो गया।

हमें गर्व होना चाहिए की अपना सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्वयं छोड़ने की क्षमता रखने वाले हम विश्व के पहले 4 देशों में से एक हैं। 

हमें गर्व होना चाहिए की डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री काल में  'मंगलयान' का प्रक्षेपण किया।

हमें गर्व होना चाहिए कि पृथ्वी,अग्नि,नाग और त्रिशूल जैसी मिसाइलें हम स्वयं बनाते हैं।

हमें गर्व होना चाहिए कि अर्जुन टैंक, तेजस विमान, धनुष तोप, हेलीकाप्टर,विमानवाहक जहाज, परमाणु पनडुब्बी आदि हम स्वयं बनाते हैं। 

हमें गर्व होना चाहिए कि आज विश्व में सबसे ज्यादा सोने का भंडार हमारे पास है। 

हमें गर्व होना चाहिए कि विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में आज हम विश्व के प्रथम 6 देशों में एक है। 

हमें गर्व होना चाहिए कि हम उस देश में पैदा हुए हैं जिस देश में राम और कृष्ण अवतरित हुए, जिस देश में महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर ने जन्म लिया, जिस देश ने महात्मा गांधी को जन्म दिया। 

“ यही है मेरा देश मुझको यकीन है
  धरा पर अगर स्वर्ग है तो यहीं है”

आपका,

ओमप्रकाश ‘नमन’ उर्फ़ मुन्ना पाण्डेय
कल्याण
मो- ९८२०७८७०३४/ ८०८०८८८९८८
e mail- namanom1960@gmail.com