Monday, 15 October 2018


धीर वीर गंभीर सब बैठे हैं चुपचाप 
कायरता करती रही चारों तरफ प्रलाप। 

मेरे कुछ विद्वान मित्र सावरकर का नाम भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के साथ लिख देते हैं. ऐसा करना सरदार भगत सिंह, अशफाक उल्ला खान और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों का अपमान करना है. 
सावरकर एक कायर क्रांतिकारी रहे जिन्होंने अपनी जान बचाने के लिए लगभग 10 बार अंग्रेजों से माफी मांगी और 1925 से 1947 तक अंग्रेजों की पेंशन पर पले.
एक तरफ जहाँ सावरकर अंग्रेज़ों को माफ़ीनामें  लिख रहे थे, वहीँ दूसरी तरफ भगत सिंह अंग्रेज़ों से कह रहे थे की उन्हें सशस्त्र क्रांति के लिए गोली मार दी जाये. 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगातार यह कु-प्रचार करता रहा है की आजादी महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन की वजह से नहीं मिली बल्कि सिर्फ सशस्त्र क्रांतिकारियों के वजह से मिली.
सशस्त्र क्रांतिकारियों को पूरी विनम्रता से प्रणाम करते हुए यह सत्य बताना जरूरी है कि हमारे सशस्त्र क्रांतिकारियों ने जितनी शहादत दी हैं उससे हजार गुना ज्यादा शहादत हमारे गांधीवादी अहिंसा वादी क्रांतिकारियों ने दी है.
सशस्त्र क्रांतिकारियों के जितने नाम आप पूरे देश में पाएंगे उससे ज्यादा अहिंसावादी क्रांतिकारियों के नाम आपको देश के हर जिले में मिल जाएंगे.
सशस्त्र क्रांतिकारियों ने भी आजादी के लिए ही हथियार उठाए और अहिंसक स्वतंत्रता सेनानियों ने भी आजादी के लिए ही फांसी की रस्सी चूमी, अंडमान निकोबार जैसी जेलों में रहे ,लाठियां -गोलियां खाई, शहादत दी.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जब अहिंसा वादी स्वतंत्र सेनानियों को कायर कहता है तो वह उनका अपमान कर रहा होता है.
जिस संगठन ने अंग्रेजो के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं किया, अंग्रेजों के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई, अंग्रेजों पर एक पत्थर तक नहीं फेंका, उस कायर और नपुंसक संगठन को कोई हक नहीं बनता कि वह शहीदों को गाली दें.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेता सशस्त्र क्रांतिकारियों और असहयोग आंदोलन के अहिंसक क्रांतिकारियों को बांट देना चाहते हैं , जबकि ऐसा नहीं है.
चंद्रशेखर आजाद ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेते हुए कोड़े खाए , भगत सिंह ने लाला लाजपत राय के साथ अहिंसक प्रदर्शन में भाग लिया और लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए बंदूक उठाई, बाबू सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष रहे , कांग्रेस में रहे और जब अंग्रेजों ने उन्हें घर में नजरबंद रखा तो वे देश से भागकर यूरोप चले गए और वहां से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए महात्मा गांधी को ही अपना नेता माना और आजाद हिंद फौज को संबोधित करते हुए कहा था कि भारत की धरती पर पैर रखते ही आजाद हिंद फौज के कमांडर इन चीफ महात्मा गांधी होंगे , सुभाष चंद्र बोस नहीं.
आज की नौजवान पीढ़ी से विनती है की वह कृपया भगत सिंह द्वारा लिखा गया साहित्य पढ़ें, बाबू सुभाष चंद्र बोस की जीवनी ढंग से पढ़ें और उन्होंने कब क्या वक्तव्य दिए हैं उनका अध्ययन करें, चंद्रशेखर आजाद के विषय में और जानकारी प्राप्त करें और यह देखें कि चंद्रशेखर आजाद और उनके साथियों को उनकी क्रांति का दीपक जलाये रखने के लिए धन कौन देता था?
आजाद हिंद फौज के अफसरों और सिपाहियों को छुड़ाने के लिए मुकदमा किसने लड़ा, भगत सिंह और उनके साथियों का मुकदमा किसने लड़ा, किसने वायसराय से लेकर लंदन तक उन्हें फांसी ना दिए जाने की शिफारस की?
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सावरकर और नाथूराम गोडसे जैसे लोग तब कहां थे ? इन कायरों को किसने मना किया था कि वह आजाद हिंद फौज के सिपाहियों का मुकदमा न लडें या भगत सिंह और उनके साथियों का मुकदमा न लड़े.
अहिंसक आंदोलन और सशस्त्र क्रांति दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू थे.
सावरकर, नाथूराम गोडसे, आरएसएस , डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे कायर जब स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध कर रहे थे, 'भारत छोड़ो आंदोलन'  का विरोध कर रहे थे , आजाद हिंद फौज के खिलाफ लड़ने के लिए भारतीय युवकों को ब्रिटिश फौज में भर्ती करा रहे थे रहे थे , धर्म के आधार पर देश के विभाजन की बात कर रहे थे, तब यह सशस्त्र क्रांतिकारी और अहिंसावादी स्वतंत्रतासेनानी स्वतंत्रता आंदोलन की अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए अपनी आहुतियां दे रहे थे.
मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मित्रों से पूछना चाहूंगा की डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता को 'सर' और उनकी मां को 'लेडी' की उपाधि क्यों दी गई ? उन्होंने ब्रिटिश सरकार की ऐसी क्या सेवा की थी कि उनके पिता और मां दोनों को उपाधियां मिली?
मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अपने मित्रों से पूछना चाहूंगा की अंग्रेजों ने 1925 से 1947 तक सावरकर को प्रतिमाह पेंशन क्यों दी?
सावरकर ऐसा क्या काम कर रहे थे जिसकी वजह से अंग्रेजों उन्हें  लगातार पेंशन दे रहे थे? अंडमान निकोबार जेल से सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने उनकी किन सेवाओं के लिए रिहा किया था ?
देश की जनता के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा देने वाले नेहरू गांधी परिवार पर प्रतिदिन झूठे आरोप लगाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मेरे मित्र देश का विभाजन करवाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना के परिवार पर 1947 से लेकर 2018 तक एक शब्द क्यों नहीं बोले. मोहम्मद अली जिन्ना का पूरा परिवार स्वतंत्रता के बाद भी मुंबई में रहता है और कई हजार करोड़ की संपत्ति का मालिक है. 

क्या मेरे आर एस एस के मित्र मोहम्मद अली जिन्ना के परिवार की चाटुकारिता से सहमत हैं?
आज,
ए कैसा मुल्क में मंजर दिखाई देता है
हर एक हाथ में खंजर दिखाई देता है. 
अतः सावरकर का नाम सरदार भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, अशफाकुल्ला खान, चंद्रशेखर आज़ाद के साथ लिखना बंद होना चाहिए. जिन आरएसएस के लोगों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ एक पत्थर तक नहीं फेंका, न तो सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक आंदोलन, भारत छोडो आंदोलन आदि में भाग लिया, उल्टा इनका विरोध करते रहे, ऐसे लोगों का महिमा मंडन नहीं होना चाहिए. 


----   चौकीदार सोया है   --- 

हर तरफ नफरत ही नफरत हर तरफ चिनगारियाँ 
जिस तरफ देखो उधर ही लुट रही हैं नारियाँ ।
आबरू खतरे में है और जान खतरे में यहाँ 
सो रहा है वो थी जिस पर सारी जिम्मेदारियाँ ।  

नफरत की राजनीती ने हमें उस मोड़ पर ला दिया है जहाँ हमारा अपना दाहिना हाथ बाए हाथ पर भरोसा नहीं कर पा रहा है। पिछले तीन -चार दशकों से सत्ता की लालच में देश की नसों में नफरत का इतना जहर भरा गया है की हर आदमी दूसरे को अपना दुश्मन समझने लगा है।

नाग-पुर से सुनुयोजित ढंग से घृणा और नफरत का जो विष पूरे हिन्दुस्तान में पिछले कई दशकों से फैलाया गया है उसका असर दिखाई पड़ने लगा है। हिन्दू विरुद्ध मुसलमान, सवर्ण विरुद्ध दलित, गुजरात विरुद्ध उत्तर भारत,  ओबीसी विरुद्ध सवर्ण, स्त्री विरुद्ध पुरुष,  पूरे देश को बाँट कर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देने में यह संगठन सफल रहा है।  

१२ अक्टूबर को सुभाषचंद्र मेडिकल कॉलेज, जबलपुर में दो सवर्ण महिलाओं का इलाज़ कर रहे डॉ. से महिला के संबंधियों ने उसकी जाति पूँछी और जब उसने कहा की वह पिछड़ी जाती का आदिवासी है तो महिला के संबंधियों ने डॉ को इतना पीटा की वह डॉ ICU में भर्ती है।  

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश में दलितों ने ब्राह्मणों के घर में घुस कर उन्हें और उनकी महिलाओं को इतना पीटा की कई लोग अस्पताल में भर्ती हैं।  

US , अटलांटा में वैज्ञानिक करण जानी को यह कह कर गरबा में भाग लेने से रोका गया की वे पहले खुद के हिन्दू होने का सबूत दें तभी उन्हें नवरात्री के गरबा में भाग लेने दिया जायेगा।

खेरागढ़(मध्य प्रदेश) , के सरेंधी में एक ४० वर्षीय किसान को २.५ लाख के लोन की वसूली के लिए तहसील कार्यालय के कर्मचारियों ने पूरे गांव के सामने इतना बेइज़्ज़त किया की उसने फांसी लगा कर आत्म हत्या कर ली।  

हिमांचल प्रदेश में धर्मशाला डिग्री कॉलेज में ४ सीनियर छात्रों ने एक प्रथम वर्ष की छात्रा के साथ दुष्कर्म करके उसे मरने के  लिए सड़क के किनारे फेंक दिया। उस छात्रा ने छेड़छाड़ करने के लिए उन चारों छात्रों के खिलाफ प्रिंसिपल से शिकायत की थी और उसी का बदला लेने के लिए यह दुष्कर्म किया गया। 

परसों गुड़गांव  में एक जज की बीबी और बेटे को उसके अपने गार्ड ने गोली मार दी। 

इस तरह की खबरे बताती हैं की हमारा समाज किस अराजकता की तरफ बढ़ रहा है।  यह समाज में एक दूसरे के प्रति पनप रहे अविश्वास, असहिष्णुता , घृणा और गुस्से का परिणाम है। अगर यह गुस्सा इसी तरह बढ़ता रहा तो यह देश और समाज के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा। इन प्रवृत्तियों को रोकने की ज़िम्मेदारी सरकारों की है।  

समाज के विभिन्न घटकों में आपस में सद्भाव का निर्माण देश की एकता और अखंडता के लिए उतनी ही जरूरी है जितना सांस के लिए ऑक्सीजन। अगर शासक ही अपने चुनावी स्वार्थ के लिए जनता को विभाजित करने लगे तो फिर देश को पतन के गर्त में जाने से कोई रोक नहीं सकता। 

जागो चौकीदार -जागो !





Saturday, 15 September 2018

हिन्दी एक संस्कृति है


आज हिंदी दिवस है पूरे विश्व के सभी हिंदी प्रेमियों को हृदय से प्रणाम.

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हिंदी पर मेरा यह  लेख 13 सितंबर 2018  के 'दोपहर' में छपा था...
हिंदी सिर्फ एक भाषा ही नहीं एक संस्कृति है. हिंदी राष्ट्रप्रेम की वह धारा है जिसने पूरे देश को एक सूत्र में पिरो रखा है.
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया हिंदी स्वतंत्र भारत की राजभाषा होगी. संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी.
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाए जाने की परंपरा 1953 से शुरू हुई.
अगर हम हिंदी भाषा और साहित्य के उद्भव काल की बात करें तो पाएंगे की अपभ्रंश के बाद हिंदी भाषा का जन्म हुआ.
इसी अपभ्रंश से ब्रज, अवधी, खड़ी बोली, मैथिली , राजस्थानी आदि का आविर्भाव हुआ. यह परंपरा सातवीं शताब्दी शताब्दी से पूरे वेग के साथ प्रारंभ हो गई.
इसीलिए डॉ रामकुमार वर्मा ने अपभ्रंश से प्रभावित आदिकाल को संधि काल का नाम दिया है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे देश भाषा का नाम दिया.
पुरानी हिंदी की लेखन परंपरा सातवीं शताब्दी से शुरू हुई .
इस परंपरा के प्रथम कवि है पुष्य. पुष्य ने सातवीं शताब्दी महापुराण' की रचना की.
हिंदी के इतिहास को तीन भागों में विभक्त किया जाता रहा है.
आदिकाल - 700 ई. से 1300 ई.
मध्यकाल- 1300 ई. से सन्1850 तक
आधुनिक काल - 1850 ई. से आज तक
यह तो रही इतिहास की बात, परंतु जिस हिंदी की हम आज बात करने जा रहे हैं, जिस हिंदी के हम ऋणी हैं, 14 सितंबर को जिस हिंदी के प्रति हम कृतज्ञता ज्ञापित करने जा रहे हैं, वह हिंदी हमारे स्वतंत्रता संग्राम की भाषा रही है. स्वतंत्रता आंदोलन को पूरे देश में पहुंचाने में हिंदी का योगदान अपरिमित रहा है.
19वीं सदी में ब्रह्म समाज के संस्थापक राजाराम मोहन राय ने कहा था; "समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है".
1917 में बाल गंगाधर तिलक ने कहा; "सिर्फ हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है."
29 मार्च 1918 को आठवें हिंदी साहित्य सम्मेलन, इंदौर में महात्मा गांधी ने हिंदी को भारत के जनमानस की भाषा कहा था.
यह बातें मैं आपको यहां इसलिए याद दिला रहा हूँ ताकि हम समझ सकें कि हमारे राष्ट्र निर्माताओं के ह्रदय में और दिमाग में हिंदी के प्रति कितना प्रेम और आदर था और वह हिंदी की अगाध क्षमताओं से कितना परिचित थे.
1925 में कांग्रेस के कानपुर राष्ट्रीय अधिवेशन में गांधी जी की प्रेरणा से प्रस्ताव पारित हुआ कि कांग्रेस की महासमिति और कार्यकारिणी समिति का काम आमतौर पर हिंदी में ही चलाया जाएगा.
बड़े दु:ख की बात है कि आज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने खुद को हिंदी से बहुत दूर कर लिया है. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से लेकर प्रदेश कांग्रेस कमेटीयों तक का अंग्रेजीकरण हो चुका है. कांग्रेस कार्यकर्ताओं में आज हिंदी और स्थानीय प्रादेशिक भाषाएं दूसरे दर्जे की भाषा मानी जातीहैं और हर तरफ उस अंग्रेजी का वर्चस्व है जिस से लड़ाई लड़कर हमारे पुरखों ने देश को स्वतंत्रता दिलाई.
महात्मा गांधी जानते थे कि सिर्फ हिंदी से ही पूरे देश को जोड़ा जा सकता है और स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी जा सकती है.
स्वतंत्रता के बाद हिंदी फिल्मों ने और बाद के दशकों में हिंदी टेलीविजन ने हिंदी भाषा को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया.
आज हिंदी बाजार की भाषा बन गई है, और जो भाषा बाजार की भाषा बन जाए वह अपने आप जन जन की भाषा बन जाती है.
हिंदी हमारे देश की धमनियों में खून बनकर दौड़ रही है और राष्ट्रप्रेम का ऑक्सीजन देश के कोने-कोने तक ले जा रही है.
स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन के बाद पिछले 7 दशकों में देश को जोड़े रखने में और देश के निर्माण में हिंदी भाषा के योगदान कि जितनी चर्चा की जाए वह कम होगी.
हमारा राष्ट्र हिंदी का ऋणी है परंतु हमारे शासकों ने हिंदी को और अधिक सक्षम बनाने के लिए जो कदम उठाने चाहिए थे नहीं उठाए इसका दु:ख भी आज 14 सितंबर को हम जैसे हिंदी प्रेमियों के मन में है. सिर्फ 1 दिन हिंदी को याद करके या एक पखवारा हिंदी पर चर्चा सत्र आयोजित करके, विभिन्न सरकारी विभागों के राजभाषा विभाग में कुछ कार्यक्रम आयोजित करके हम हिंदी के ऋण को उतार नहीं पाएंगे और ना तो हिंदी को विकसित होने के लिए जिन संसाधनों और वातावरण की जरूरत है वह उपलब्ध करा पाएंगे.
आज जरूरत है हिंदी के निरंतर विकास की ताकि हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं की बराबरी में अपना सम्मानित स्थान प्राप्त कर सके.
आज हिंदी में साहित्य कितना लिखा जा रहा है और कैसा लिखा जा रहा है उस पर चर्चा न करके अगर मैं यह कहूं कि हिंदी के सुधी पाठक हिंदी साहित्य बहुत कम पढ़ रहे हैं तो ज्यादा उचित होगा. विभिन्न आंचलिक भाषाओं की तुलना में हिंदी का पाठक हिंदी को उतना प्रेम नहीं दे पा रहा है जितना हिंदी के संवर्धन और विकास के लिए जरूरी है. पिछले दो - तीन दशकों से हिंदी की गंगा सूखती नजर आ रही है.
हिंदी लेखकों, साहित्यकारों और विद्वानों पर जिम्मेदारी है कि वह हिंदी को और अधिक व्यवहारिक और वैज्ञानिक भाषा के रूप में विकसित करें . हिंदी हमारे राष्ट्र की अस्मिता की प्रतीक है. हिंदी विदेशों में भारत की पहचान है. हिंदी के विद्वानों , लेखकों, सुधी पाठकों के लिए 14 सितंबर "हिंदी दिवस" एक राष्ट्रीय पर्व है. आईए इस पर्व पर हिंदी उत्तरोत्तर विकास और प्रगति की कामना करें..
नमन

Saturday, 26 May 2018

कोई माने न माने


कोई माने न माने
मोहब्बत संक्रामक रोग है
मेरी मोहब्बत के
संक्रमण से उसकी आँखें लाल हैं
गालों पर सुर्खी है
होठों पर गीत हैं
आवाज़ में खनखनाहट है
मैं जानता हूँ
यह सब
आने वाली बहार की आहट है.  'नमन'


मंचों से बकैती
जेबों पर डकैती
शहरों में फिरौती
राजनीती में बपौती
बाबाओं की पनौती
और नेताओं में  छिनरौती आम है
बद अच्छा है
और अच्छा बदनाम है
पापियों का नारा
जय श्रीराम है.    'नमन'

Thursday, 24 May 2018

नशा

     - नशा -

कैसे जी सकता है कोई 
दूर- दूर तक फैले रेगिस्तान सी
उदास ज़िंदगी 
मायूस सुबह
थकी हुयी शाम
और सिसकती रात
कोई नशा तो हो
जिसके सहारे काट सकें
हम यह पहाड़ सी ज़िन्दगी
सो हमने थाम लिया
मोहब्बत का दामन .....    'नमन'

Tuesday, 22 May 2018

संसद के सामने




संसद के सामने
नग्न होकर किया प्रदर्शन
तमिलनाडु के किसानों ने
नंगा हो गया
प्रधानमंत्री 
और उसका पूरा मंत्रिमंडल....





अपने बलात्कारी विधायक को
बचाने के लिए
उसने की प्रयत्नों की पराकाष्ठा
तब सबने देखा
कपड़ों के पीछे नंगा है
वह भगवाधारी...





१०० करोड़ की घूस माँगते हुए
५०० और २००० के नोटों में
चिप्स लगे होने की बात करते हुए
नकली वीडियो दिखाकर
नवजवान छात्रों को देशद्रोही करार देते हुए
सर्जिकल स्ट्राइक के वीडियो दिखाने की बात करते हुए
विधायकों की खरीद फरोख्त का समर्थन करते हुए
नंगे हो जाते हैं वे
और मैं
टीवी बंद कर देता हूँ .....




बात मत करो तुम
पेट्रोल के बढ़ते दामों की
मंहगाई की
बेरोजगारी की
सीमा पर शहीद होते जवानों की
खेत में मर रहे किसानों की
सरकारी लूट की
बलात्कार की छूट की
बेईमानी की- झूठ की
प्रधानमंत्री के जुमलों की
प्रजातंत्र पर हो रहे हमलों की
डरो तुम
तुम्हे मुसलमानों से खतरा है....       'naman'

Tuesday, 24 April 2018

खबरें रखैल है



मैं उसे देता रहा अपनी खताओं की सजा
मुस्कुराकर जिसने मेरे सारे गम अपना लिए।   नमन

दिल का अहवाल सुनाएँ तो सुनाएँ कैसे
ज़ुबान खामोश हो जाती है इश्क़ होने पर।  नमन 


-खबरें रखैल है-
खबरें रखैल है
सत्ताधीशों की
पूंजीपतियों की
भ्रष्ट अफसरों की
रोज-रोज
काला होता है
अखबारों का
मुख (पत्र)
बदनाम
बिकी हुई खबरें
फैलाती हैं सनसनी.
संपादक
बदनाम गली के बाहर तैनात
वह पुलिसिया है
जो मजबूरी में
दूसरी तरफ देखता रहता है
आख़िर
उसका भी पेट है.
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
बदनाम गली को
पांच सितारा होटल तक ले आई है
यहां खबरें चमकती हैं
मटकती हैं
बिकती हैं ऊंचे भाव में
इज्जत से.
नमन  

Saturday, 31 March 2018

वह सनातन धर्म पर खतरे का झूठा बिगुल बजा रहे हैं और देश के युवाओं  के मन में नफरत के बीज बो रहे हैं.

यह भूल जाते हैं जब सैकड़ों वर्षों तक देश पर मुग़लों ने राज किया तब भी हिन्दू धर्म खतरे में नहीं पड़ा।

राणा प्रताप के दादा राणा सांगा ने बाबर को हिंदुस्तान बुलाया था अपने दुश्मनों के खिलाफ लड़ने के लिए. बाद के दिनों में मुगलों और राजपूतों में रिश्तेदारियां हो गई.

 हल्दीघाटी की लड़ाई में अकबर की सेना का नेतृत्व राजा मानसिंह कर रहे थे.राणा प्रताप के सगे भाई भी अकबर की फौज में मानसिंह के साथ थे और राणा प्रताप के खिलाफ लड़ रहे थे.

हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की फौज के सेनापति थे अफगानी योद्धा हकीम सूर जो  अफगान मुसलमानों की टुकड़ी के साथ राणा प्रताप की तरफ से लड़ रहे थे.

कितने ही राजपूत राजाओं ने मुग़लों के साथ मिलकर अपने दुश्मन हिन्दू राजाओं का सफाया करवाया फिर भी हिन्दू धर्म खतरे में नहीं पड़ा.

फिर अंग्रेजों द्वारा पोषित और स्थापित एक संगठन अस्तित्व में आया और तबसे हिन्दू खतरे में है।

जो सनातन धर्म  सैकड़ों वर्ष के मुगल और ब्रिटिश शासन में नष्ट नहीं हुआ जब हिंदुओं की जनसंख्या 20 करोड़ से भी कम थी और वे गुलाम थे, तब आज 100 करोड़ हिंदुओं को कौन खत्म कर सकता है?

वे हमारे युवाओं को मूर्ख बनाकर उनके हाथों से किताबें छीनकर उनको तलवारें पकड़ाने का पाप कर रहे हैं.

यह एक कायर और नाकामयाब जमात है. यह भूल जाते हैं कि ताकत बाजुओं में नहीं दिमाग में होती है.

 इस कायर जमात से इस देश के युवा का सुखद भविष्य बर्दाश्त नहीं हो रहा है .

हथियारों के दम पर दुनिया की कोई सभ्यता विकसित नहीं हुई।  साहित्य, संगीत, कला और विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति से सभ्यताओं का विकास होता है और कोई भी धर्म महान बनता है.

हमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, इराक से लेकर तुर्की तक अपने हाथ में हथियार लेकर घूम रहे इस्लामी जिहादियों से सबक लेना चाहिए.

 इस्लाम के नाम पर इन लोगों ने पिछले चार दशकों में करोड़ों मुसलमानों का खून बहाया है.

हिंदू नव युवकों के हाथ से किताबें छीनकर उनके हाथ में तलवार देने वालों क्या तुम चाहते हो कि कल इस देश का हिंदू ही हिंदू का खून बहाए. हिंदुस्तान को सीरिया बनाना चाहते हो तुम?

हमारे नौजवानों के ह्रदय में नफरत नहीं  बल्कि प्रेम का संगीत बजना चाहिए.  उनके हाथों में तलवारें नहीं बल्कि कलम और रंगों की कूंचियां होनी चाहिए जिससे वे संसार को और सुंदर बना सके.
प्रेम करने वाले ह्रदय बलात्कार नहीं करेंगे न तो वे करेंगे हत्याएं.

प्रेम करने वाले नवयुवक दूसरे की जान बचाने के लिए अपनी जान दे देंगे किसी की जान नहीं लेंगे.

आज महावीर जयंती है. यह देश महावीर और गौतम बुद्ध का देश है.
यह त्याग की मूर्ति राम का देश है .
यह प्रेम की बांसुरी बजाने वाले कृष्ण का देश है.
यह देश महात्मा गांधी का देश है.

हम विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता के वारिस है.  सिर्फ भारत ही नहीं पूरे विश्व को प्रेम और शांति का संदेश देने की जिम्मेदारी हमारी है.

डॉ. इकबाल ने कहा था-
 "मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना- हिंदी हैं हम वतन है हिंदुस्ता हमारा"

आइए पूरे विश्व को सत्य, अहिंसा और प्रेम का संदेश दें.
जियो और जीने दो का संदेश दें.
इंसानियत का संदेश दें.
 'वसुधैव कुटुंबकम' का संदेश दें.
नमन

Wednesday, 7 March 2018

झूठ पुराण

भारतीय संविधान की अलिखित, असंकलित, अस्पष्ट धारा में सभी जन-प्रतिनिधियों को झूठ बोलने का महान अधिकार दिया गया है. नेताओं को संसद से लेकर सडक तक झूठ ही झूठ बोलने की परम छूट है.
झूठ के इसी उर्जा स्रोत पर चढ़ कर, झूठ का मनन और विष वमन करते हुए नेतागण सत्ता सुंदरी का वरण करते हैं.
सत्य शर्मिंदा है और छिप कर आत्महत्या की तैयारी कर रहा है.

सीमा पर शहीद हो रहे जवानों का सच..
आत्म हत्या कर रहे किसानो का सच..
भूखे मजदूरों का सच..
बेरोजगार नौजवानों का सच..
बलात्कार पीड़ित महिलाओं का सच ..
घर में सताई और जलाई जा रही बहुओं का सच ..
अपने ही वरिष्ठो द्वारा सताए जा रहे सिपाही का सच ..
ऐसे कितने ही सच प्रति दिन आत्म हत्या कर रहे हैं...
जो नहीं मरना चाहता, ऐसे सच का गला व्यवस्था घोंट देती है.

झूठ संविधान द्वारा आरक्षित, सुरक्षित, संरक्षित और प्रतिस्थापित है.
झूठ और अफवाहों पर ही आधुनिक भारत का अस्तित्व टिका हुआ है, वरना अधिकांश नेता जो आज अभूतपूर्व कहे जाते हैं कब के भूतपूर्व हो गए होते.
जो जितना सफाई से जितना जादा झूठ बोले उसका उतना विकसित होना तय है. हम सबको झूठ सुनने की आदत पड़ गई है.

सच बोले तो लात मिलेगी
झूठे को सौगात मिलेगी
चर्चा अगर सत्य की की तो
गोली और हवालात मिलेगी.. . .

सत्य लोगों के कान में गर्म शीशे की तरह उतरता है.
लोग उसे सहन नहीं कर पते और विक्षिप्त हो जाते हैं.

झूठ मधुर है, मनोरम है,
तुम्हारा है, मेरा है,
घरवालों का है, रिश्तेदारों का है,
मित्रो का है, सहयोगियों का है.

अतः सर्वत्र व्याप्त है और सर्व प्रिय है.
बोलो, झूठ की जय हो !
सत्य का नाश हो !
प्राणियों में झूठ की भावना हो!
झूठ का विकास हो !
विश्व में सर्वत्र झूठ व्याप्त हो !

'नमन'


उसके नाम...

उससे मिलना भी इक कहानी थी
कभी वह भी मेरी दीवानी थी..

प्रेम था
दर्द था -आस थी
वो मेरे दिल की धड़कन
मेरा विश्वास थी.

कभी देखे थे हमने
उसकी आंखों से ख्वाब
रोमानियत में उसका
नहीं था कोई जवाब ...

उलझी हुई
जीवन की पगडंडियों पर
आगे बढ़ती हुई
खो गई वह
जैसे कभी उसकी
उलझी जुल्फों में
खो जाया करता था मैं...

आज भी खोजता हूं
उसे अकेले में
भीड़ में
जिंदगी के मेले में
हां
उससे मिलना भी इक कहानी थी
कभी वह भी मेरी दीवानी थी..

जब भी लहराता है
कोई रंगीन दुपट्टा
ढलती है गर्मियों की शाम
या
गरजकर बरसता है
सावन का मेघ
महकती है रात रानी
खनकती है चूड़ियां
धीरे से बजती है पायल
चुपचाप खामोशी से
उसकी याद
चली आती है
मेरे पास
उतर जाती है सांसो में
आहिस्ता
और
मैं, मैं नहीं रह जाता
हाँ
उसका मिलना भी इक कहानी थी
कभी वह भी मेरी दीवानी थी.
नमन