Monday, 11 January 2016

शास्त्री जी की पुण्य तिथि पर किसानो को याद करते हुए.

शास्त्री जी की पुण्य तिथि पर किसानो को याद करते हुए.

खेती अन्य उद्योगों की तरह सिर्फ जीविका कमाने का माध्यम नहीं है. 
यह एक जीवन दर्शन है, जीने की एक विशिष्ट कला है जिसे अँग्रेजी विद्यालयों में पढा लिखा, हर बात में नफा नुकसान जोडने वाला तथाकथित अभिजात्य समाज समझने में असमर्थ रहा है.
कृषि से जुडी लगभग ७०% भारतीय जनता की देश के नीति निर्धारण में कोई भूमिका नहीं है. 
नीतियाँ बनाने वाला प्रशासकीय वर्ग किसानों की समस्याओं, उनकी तकलीफों, उनकी भावनाओं से अनभिग्य है. 
पिछले दो तीन दशकों की ही बात करें तो अंग्रेजी स्कूलों में पढे चिदाम्बरम, जेटली, मनमोहन सिंह जैसे वित्तमंत्रियों और लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के स्नातकों से किसानों का दर्द समझने की उम्मीद रखना व्यर्थ है. असंगठित खेतिहर किसानो का शोषण करके संगठित उद्योग जगत को आर्थिक लाभ पहुँचाने का काम कांग्रेस सहित सारी राजनैतिक पार्टियों ने लगातार किया है. 

पंडित नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा जी और कुछ हद तक राजीव गांधी के शासन तक किसान भारतीय अर्थव्यवस्था के राडार पर था. उसके बाद के किसी प्रधानमंत्री ने उनकी तरफ मुड़ कर नहीं देखा.
सरकारों ने अन्नदाता किसान को उसकी पैदावार का उचित मूल्य देना तो दूर, उसे वह सम्मान तक नहीं दिया जिसका वह हकदार है.
पटवारी, कानूनगो, ग्राम सेवक, लेखपाल, बीडिओ आदि किसान के शोषण तंत्र की वह इकाइयां हैं जिन्होने भारत के किसान की कमर के साथ साथ उसका मनोबल भी तोड दिया है.
किसान का मनोबल इतना टूट गया है कि वह आत्महत्या करने पर उतारू है.
सारा सरकारी तंत्र जिसे किसान की सहायता के नाम पर खडा किया गया है, किसानों के खिलाफ है.
यह सरकारी तंत्र ही बेरोजगार पैदा कर रहा है.
शहर का कचरा गाँव में डाला जा रहा है. औद्योगिक इकाईयों से निकल रहा धुंवा हवा को, उनके केमिकल हमारी नदियों के पानी को और जमीन के नीचे के पानी को प्रदूषित कर रहे हैं. इस केमिकल युक्त प्रदूषित पानी से सिंचित फसलों का उत्पादन घटा है.
गाँव की नदियों का पानी शहरों की प्यास बुझा रहा है और गाँव प्यासा है.
नव वर्ष पर ईश्वर हमारे नीति निर्धारकों को सद्बुद्धि दें कि वे गाँवों का शोषण बंद करें और किसानों को न्याय दें.
'नमन
'

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