Monday, 26 October 2015



दिनांक- २४ /१० २०१५

आज के नव भारत टाइम्स में अपने ब्लॉग में सतीश मिश्र जी ने कुछ सार्थक प्रश्न उपस्थित किये हैं. देश की वर्तमान परिस्थितियां देश के सारे समाजिक सौहार्द और ताने बाने को ध्वस्त करके देश को विध्वंस की तरफ धकेल रहीं हैं. सत्ता में बैठे सत्ताधीश दिग्भ्रमित हैं और विपक्ष नेस्तनाबूत. देश अति भ्रष्ट प्रशासकीय अधिकारियों और राम भरोसे छोड़ दिया गया है.
जिसे देखिये वही नफरत की बात कर रहा है, धर्मान्धता सिर पर चढ़ कर बोल रही है, जातिवाद और प्रान्तवाद सिर उठाये खड़ा है. ऐसे वातावरण में औद्योगिक विकास और निवेश की बात करना बेमानी है.
देश के नवजवानों की जिस पीढ़ी से हमने विकास के स्वप्न सजाए थे उस  शहरी पढ़े लिखे युवक में जातिवाद और साम्प्रदायिकता की जड़ें गहरी रोपी जा चुकी हैं. हिन्दू संघठन लगातार मुस्लिम द्वेष की बात कर रहा है, दलित युवकों में सवर्णों विशेषकर ब्राह्मणों के प्रति नफ़रत का जहर कूट कूट कर भरा जा रहा है. शिक्षा नीति का तेज़ी से भगवाकरण शुरू है. इतिहास फिर से लिखने की बात हो रही है.
हम क्या खायेंगे और क्या पहनेंगे यह मुल्ला मौलवी और साधू संत तय करेंगे. कौन देश द्रोही है और कौन देश भक्त यह आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन तय करेंगे. 
कौन किससे शादी करेगा यह खाफ पंचायते तय करेंगी. पुलिस का राजनैतिककरण पहले ही हो चुका था अब उसे धर्म के नाम पर बाँटने का काम ज़ारी है. पुलिस अफसर सीधे धार्मिक नेताओं से आदेश ले रहे हैं.
कोई किसी को माफ़ करने के मूड में नहीं है. ईंट का बदला पत्थर से लेने की बातें हो रहीं हैं. फुसफुसाहटें धीरे-धीरे शोर में बदलती जा रही हैं.
इन सबका सीधा असर देश के औद्योगिक विकास और विदेशी निवेश पर हो रहा है. विदेशी निवेशकों तक जो मुनाफे के लिए हमारे देश में निवेश करना चाहता है उसे उसका निवेश असुरक्षित दिखाई देगा तो वह हमारे देश में क्यों निवेश करेगा? निवेश कम होने से औद्योगिक विकास धीमा हुआ है और बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है.
नीतियों का दिवालियापन स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है. क्रूड के अन्तरराष्ट्रीय भाव एक तिहाई हो जाने के बाद भी इम्पोर्ट बिल सुरसा के मुंह सा बढ़ता जा रहा है और एक्सपोर्ट कम हुआ है. यह चिंता विषय है.
हम इतिहास के उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ गलतियों के लिए जादा जगह नहीं है और न तो गलतियों के सुधार के लिए समय है. पूरी सत्ता पीएमओ में केन्द्रित है और सामूहिक नेत्रित्व का सर्वथा अभाव है. न तो प्रश्न उपस्थित किया जा रहे हैं न नीतिगत निर्णय लेते समय संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा हो रही है. विपक्ष कमजोर, विखरा हुआ और असहाय है. ऐसे में गलतियों की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.
राजनैतिक विश्लेषकों में निराशा के साथ साथ भ्रम की भी स्थिति है. वे समझ नहीं पा रहे हैं की क्या हो रहा है ? १२५ करोड़ लोगों के देश के सत्ता और विपक्ष में विचारकों और दूरदर्शिता रखने वाले राजनेताओं की कोई कमी नहीं है पर वे हाशिये पर हैं. चाटुकार सत्ता के नज़दीक हैं और समझदार सत्ता से मीलों दूर अपने घर बैठा दिए गए हैं . अपनी ही एक रचना के साथ लेखनी को विराम देना चाहूँगा....

सत्ता की शतरंज बिछी है, शकुनि घात लगाए हैं
प्रजा दांव पर लगी हुई है, कौरव दृष्टि जमाये है।
कौरव दोषी हैं लेकिन क्या धर्मराज कम दोषी हैं
राम भरोसे छोड़ प्रजा को, चौसर मे भरमाए हैं।
का-पुरुषों की नगरी दिल्ली खडयंत्रों की नगरी है
गली- गली मे जयचंदों ने अपने जाल बिछाए हैं।
मंत्री- संतरी चाटुकार हैं, लोभी और लालची हैं
रक्षक ही अब भक्षक बनकर, प्रजा को लूटे-खाये हैं।  
रोज यहाँ ईमान बिक रहा, न्याय बिके है कौड़ी मे
देश की बोली लगी हुयी है, पांडव शीश झुकाये हैं। 
चीरहरण सड़कों पर नित ही करता आज दुशासन है
सत्ता के सिंहासन पर, हमने धृतराष्ट्र बिठाये हैं। 
कौन जगाए आज भीम को, भीष्म निठल्ले बैठे हैं
अर्जुन की नज़रें नीची हैं, वे खुद पर शरमाये हैं।
कृष्ण कहाँ हो? बनो सारथी, दुष्टों का संहार करो
बोझ कम करो धरती का, माँ त्राहि-त्राहि चिल्लाये है।

नमन

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