Wednesday, 10 June 2015

धर्म और राजनीति

धर्म और राजनीति---

पिछले कई हज़ार साल का इतिहास गवाह है की धर्म जब जब संगठित होकर राजनेताओं के हाथ की कठपुतली बना है वह भयंकर नरसंहार और विनाश का कारण बना है. समय-समय पर कमजोर शासकों और राजनेताओं ने बड़ी चालाकी से धर्म को संगठित करके उसका इस्तेमाल सत्ता और सिंहासन के लिए किया है.
धर्म की आड़ में अपनी कमजोरियां और कुकर्म छिपाने वाले शासको और राजनेताओं के यहाँ धर्मगुरुओं की बड़ी पूंछ रही है. अपनी अतार्किक और असत्य बातें ये शासक ईश्वर, अल्लाह, जीसस आदि के नाम पर जनता पर थोपते आये हैं. विभिन्न हिंदूवादी और मुस्लिमवादी संगठन और पार्टियाँ आज फिर बड़ी तेज़ी से धर्म नामक नशे को नवजवानों की नयी पीढ़ी के खून में भरने की कोशिश में लगी हुयी हैं. दुनियां का कोई धर्म, कोई मजहब नफरत और घृणा नहीं सिखाता परन्तु ये लोग धर्म के नाम पर नफरत का ज़हर समाज में बाँट रहे हैं.
अगर स्वतंत्रता के बाद के भारत की बात करें तो हम पाते हैं की कितनी चालाकी से धर्म के नाम पर अपनी रोटी चलाने वाले मुस्लिम नेताओं ने उर्दू को भारतीय मुसलमानों की भाषा साबित किया. जबकि उर्दू पूरी तरह भारत में जन्मी, पली, बढ़ी भारतीय कायस्थों की भाषा रही है. पर उर्दू के नाम पर आम मुसलमान और आम हिन्दू में एक विभाजन की रेखा खींची गयी.
मुस्लिम कट्टरपंथियों की वजह से ही मुसलमान शिक्षा में पीछे रह गए. लड़कियों को पढ़ने नहीं दिया गया. कुछ अपवादों और पढ़े लिखे समझदार मुसलमान भाईयों को छोड़ दे जिन्होंने अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दी तो अधिकांश मुस्लिम बच्चों को मदरसों में पढाया गया. स्वतंत्र भारत में मुसलमानों की २ पीढ़ियों को इन्ही मुल्ला मौलवियों ने बरबाद किया. इसकी वजह से सरकारी नौकरियों और बड़े औद्योगिक संस्थानों में इनकी उपस्थिति नगण्य है. फिर भी आज का मुसलमान क्यों ओवैसी जैसे कट्टरपंथियों की सुनता है यह मेरी समझ के परे है.
इसी तरह हिन्दू धर्म के नाम पर अपनी रोटी चलाने वाले हिन्दू कट्टरपंथियों और इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को बरगलाने वाले मुल्ला मौलवियों ने लगातार संख्या बढाने के नाम पर जादा बच्चे पैदा करने की वकालत की. इससे उन्होंने अपनी कौम का और देश का कितना बड़ा नुकसान किया है वे खुद जानते हैं. बच्चों की फौज तो इन्होने खड़ी कर दी पर उनके लिए शिक्षा, नौकरी, घर और रोटी कहाँ से लायेंगे यह उन्होंने नहीं सोचा.
हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथी दोनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. तोगड़िया और ओवैसी जैसे लोगों में कोई फर्क नहीं है और इन दोनों का धर्म से कुछ लेना देना नहीं है. दोनों सिर्फ अपनी दूकान चला रहे हैं. एक मुसलमानों को गाली देकर ९० करोड़ हिन्दुओं का नेता बनता है तो दूसरा हिन्दू संगठनो को गाली देकर १७ करोड़ मुसलमानों की रहनुमाई की बात करता है. दोनों के भाषणों की स्क्रिप्ट एक ही जगह लिखी जाती है. तय होता है की आप ऐसे ललकारिये और मै ऐसे हुन्कारुंगा.
एक बात और - कांग्रेस जैसी सेकुलर पार्टी में भी कुछ मुस्लिम नेता जब हम मुसलमान, और हम २५ करोड़ हैं, हम ये कर देंगे- वो कर देंगे कहते हैं तो मुझे उन पर दया आती है. ऐसे लोगों के लिए कांग्रेस में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. कांग्रेस में जैसे हिन्दू कट्टरवादिता के लिए जगह नहीं है वैसे ही कांग्रेस में मुस्लिम कट्टरवादिता और जो लोग खुद को सिर्फ मुसलमानों का नेता मानते हैं उनके लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए.
कांग्रेस सारे भारतीयों का प्रतिनिधित्व करनेवाली "भारतीय राष्ट्रीय सभा" है और रहेगी. इसमें हर भारतीय के लिए सम्मानित स्थान है और होना चाहिए. बीजेपी, बसपा, सपा या अन्य राजनैतिक दल अगर गलतियाँ करे तो एक बार उन्हें क्षमा किया जा सकता है परन्तु कांग्रेस को कभी क्षमा नहीं किया जा सकता. कांग्रेस ने शहादत दी, देश स्वतंत्र कराया, देश जोड़ा, देश बनाया-बढाया, इसे मज़बूत किया, इसकी हिफाज़त की. यह भार कांग्रेस पर ही है की वे देश को विघटनकारी ताक़तों से बचाएं, कमज़ोर न होने दें. देश के लिए बलिदान देने, अपना सर्वस्व निछावर करने की परंपरा का निर्वहन कांग्रेस के सिपाहियों को ही करना है.
जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष,
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष.
इन्ही भावनाओं और संभावनाओं के साथ देश की युवा पीढ़ी को संकल्प लेना होगा की उनके लिए ‘देश प्रेम’ सबसे बड़ा धर्म है, देश की प्रगति ही सबसे बड़ा लक्ष्य है और देश पर अपने प्राण तक निछावर कर देना ही सबसे बड़ा कर्तव्य है.

 'naman' 

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