Saturday, 10 September 2016

रात गहरी है



रात गहरी है राज़ गहरे हैं
अब मोहब्बत पे लगे पहरे हैं.
पहले ये रातें गुनगुनाती थी
अब मुंह बंद, कान बहरे हैं.

हम हलाकान हैं अफवाहों से
यहाँ पल-पल बदलते चेहरे हैं.
कैसे उनपे भरोसा कर ले हम
वो किसी तीसरे के मोहरे हैं.
उम्र भर जिसका इंतज़ार किया
वो किसी और दिल में ठहरे हैं.
अब अवाम से किसको मतलब
रहनुमा सारे अंधे- बहरे हैं.
हैं तिरंगे तुम्हारे हाथों में
तिरंगे मेरे दिल में फहरे हैं.
इन नौजवान आँखों में देखो
इन मे सपने कई सुनहरे हैं.
नमन

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